होलिका दहन आज 2 मार्च, सोमवार को मनाया जा रहा है। हर वर्ष फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि पर यह पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। इस बार विशेष बात यह है कि पूरी रात भद्रा का प्रभाव रहेगा, इसलिए शास्त्रों के अनुसार भद्रा रहित शुभ समय में ही होलिका दहन किया जाएगा। होली से एक दिन पहले मनाया जाने वाला यह पर्व बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। इस दिन महिलाएं शुभ मुहूर्त में होलिका पूजन कर परिवार की सुख-समृद्धि और आरोग्य की कामना करती हैं, तत्पश्चात शुभ समय में दहन किया जाता है।
क्यों मनाया जाता है होलिका दहन?
होलिका दहन की कथा राजा हिरण्यकश्यप और उनके पुत्र प्रह्लाद से जुड़ी है। कथा के अनुसार, हिरण्यकश्यप स्वयं को ईश्वर मानता था, जबकि प्रह्लाद भगवान विष्णु के परम भक्त थे। क्रोधित होकर हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका की मदद से प्रह्लाद को अग्नि में जलाने का प्रयास किया। होलिका को अग्नि से न जलने का वरदान प्राप्त था, लेकिन अधर्म के कारण वह स्वयं अग्नि में भस्म हो गईं और प्रह्लाद सुरक्षित बच गए। इसी घटना की स्मृति में होलिका दहन किया जाता है।
तिथि और महत्वपूर्ण समय
- पूर्णिमा तिथि प्रारंभ: 2 मार्च, शाम 5:55 बजे
- पूर्णिमा तिथि समाप्त: 3 मार्च, शाम 5:07 बजे
ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार:
- होलिका दहन: 2 मार्च
- चंद्र ग्रहण: 3 मार्च
- रंगों की होली: 4 मार्च
भद्रा का समय
भद्रा का आरंभ 2 मार्च शाम 5:55 बजे से होगा और 3 मार्च सुबह 5:28 बजे तक रहेगा। यानी पूरी रात भद्रा का प्रभाव रहेगा।
होलिका दहन शुभ मुहूर्त 2026
शास्त्रों के अनुसार यदि पूरी रात भद्रा हो तो भद्रा मुख को छोड़कर भद्रा पुंछ में दहन करना शुभ माना जाता है।
शुभ मुहूर्त:
2 मार्च की मध्यरात्रि 12:50 बजे से 2:27 बजे तक (भद्रा पुंछ काल)
पूजा सामग्री
- सूखी लकड़ियां
- गेहूं की बालियां
- गोबर के उपले
- सूखी घास
- फूल, गुलाल, रंग
- मूंग, गुड़
- धूप, हल्दी, अक्षत, रोली
- जौ, माला
- कलश में जल
- बताशा, नारियल, कपूर, मिठाई
- कच्चा सूत / रक्षा सूत्र
होलिका दहन पूजा विधि
- खुले स्थान पर लकड़ियां और उपले एकत्र कर होलिका की संरचना बनाएं।
- उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
- भगवान नरसिंह और भक्त प्रह्लाद का स्मरण करें।
- होलिका स्थल पर जल अर्पित करें (जल में थोड़ा दूध और घी मिलाएं)।
- चावल, फूल और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करें।
- गेहूं की सात बालियां और गोबर के उपले अर्पित करें।
- कच्चे सूत से होलिका की तीन या सात परिक्रमा करें।
- परिवार की सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य की कामना करें तथा बड़ों का आशीर्वाद लें।
होलिका दहन केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि सत्य, श्रद्धा और धर्म की विजय का प्रतीक है। यह पर्व हमें सिखाता है कि अंततः बुराई का नाश और अच्छाई की जीत निश्चित है।
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