कलावा को मौली या रक्षा सूत्र भी कहा जाता है और यह पूजा-पाठ, हवन, विवाह, व्रत तथा विशेष अनुष्ठानों का अनिवार्य अंग है। शास्त्रों के अनुसार इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का वास माना गया है। इसे धारण करने से नकारात्मक ऊर्जा, बुरी नजर और अनिष्ट प्रभावों से रक्षा होती है, साथ ही यह साधक को अपने संकल्प से बांधे रखता है।
कलावा किस हाथ में बांधना चाहिए
धार्मिक परंपरा के अनुसार पुरुषों और अविवाहित कन्याओं को कलावा दाहिने हाथ की कलाई पर बांधना चाहिए, जबकि विवाहित महिलाओं के लिए बायां हाथ शुभ माना गया है। दाहिना हाथ कर्म का और बायां हाथ भावना व गृहस्थ जीवन का प्रतीक माना जाता है, इसलिए यह भेद रखा गया है। मंत्रोच्चारण के साथ बंधा कलावा अधिक प्रभावशाली माना जाता है।
कलावा बांधने की सही विधि और मंत्र
कलावा बंधवाते समय हाथ में दक्षिणा लेकर मुट्ठी बंद करनी चाहिए और दूसरा हाथ सिर पर रखना चाहिए। कलावा बंध जाने के बाद दक्षिणा पंडित या पूजन कराने वाले को दी जाती है। इसे कलाई पर 3, 5, 7 या 9 बार लपेटना शुभ माना गया है। बांधते समय “येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वाम् अभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥” मंत्र का जाप करना कलावा को रक्षा कवच का रूप देता है।
कलावा कितने समय तक पहनना शुभ है
मान्यता है कि कलावा तब तक पहनना चाहिए, जब तक वह स्वयं न खुल जाए या टूट न जाए। कई स्थानों पर 7, 11 या 21 दिनों तक कलावा धारण करने की परंपरा भी है। यदि कलावा अत्यधिक गंदा हो जाए या उसका रंग फीका पड़ जाए, तो उसे बदल देना उचित माना जाता है, क्योंकि अशुद्ध कलावा शुभ फल नहीं देता।
जन्म और मृत्यु के समय कलावा से जुड़े नियम
जन्म और मृत्यु के समय सूतक लगने पर कलावा धारण नहीं करना चाहिए। यदि पहले से हाथ में कलावा बंधा हो, तो सूतक प्रारंभ होते ही उसे विधिपूर्वक उतार देना चाहिए। सूतक काल समाप्त होने और शुद्धि के बाद ही नया कलावा धारण करना शास्त्रसम्मत माना गया है।
कलावा उतारने के बाद क्या करें, क्या न करें
कलावा उतारने के बाद उसे इधर-उधर फेंकना अशुभ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसे किसी पवित्र स्थान पर रखना चाहिए। बहते जल में प्रवाहित करना, मिट्टी में दबाना या किसी वृक्ष की जड़ में रखना उत्तम माना गया है। ऐसा करने से कलावा से जुड़ी सकारात्मक ऊर्जा का सम्मान होता है।
कलावा और जीवन में अनुशासन का संदेश
कलावा केवल बाहरी रक्षा नहीं, बल्कि आंतरिक अनुशासन और मर्यादा का प्रतीक भी है। इसे धारण करने वाला व्यक्ति अपने आचरण, वाणी और कर्म को शुद्ध रखने का संकल्प लेता है। इसलिए इसके नियमों का पालन करना आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत आवश्यक है।
Comments (0)