नई दिल्ली. हालिया शोध के अनुसार पिछले कुछ दशकों में भारत की भूमि का तापमान वैश्विक औसत की तुलना में कम बढ़ा है। जहां दुनिया में तापमान वृद्धि अधिक रही, वहीं भारत में यह वृद्धि सीमित दिखाई दी। यह अंतर पहली नजर में राहत देने वाला लगता है, लेकिन वैज्ञानिक इसे एक अस्थायी स्थिति मान रहे हैं, जिसके पीछे कुछ विशेष कारण जिम्मेदार हैं।
वायु प्रदूषण का ‘कूलिंग इफेक्ट’
शोध में बताया गया है कि वायु प्रदूषण, विशेषकर एरोसोल, सूर्य की किरणों को अवरुद्ध कर पृथ्वी की सतह को अपेक्षाकृत ठंडा बनाए रखते हैं। यही कारण है कि कई क्षेत्रों में तापमान वृद्धि धीमी रही। हालांकि यह प्रभाव प्राकृतिक नहीं बल्कि प्रदूषणजनित है, जो स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बना हुआ है।
उत्तर भारत में कम तापमान वृद्धि का रहस्य
उत्तर भारत में सर्दियों के दौरान तापमान में अपेक्षाकृत कम वृद्धि देखी गई है। इसका मुख्य कारण इस क्षेत्र में उच्च स्तर का वायु प्रदूषण और व्यापक सिंचाई व्यवस्था है। सिंचाई से उत्पन्न नमी और वाष्पन वातावरण को ठंडा बनाए रखते हैं, जबकि प्रदूषण सूर्य की गर्मी को जमीन तक पहुंचने से रोकता है।
स्वच्छ वायु नीति का उल्टा असर
सरकार द्वारा चलाए जा रहे स्वच्छ वायु अभियानों से प्रदूषण में कमी आने की उम्मीद है, जो स्वास्थ्य के लिए सकारात्मक है। लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी सामने आ रहा है। जैसे-जैसे प्रदूषण घटेगा, वैसे-वैसे यह ‘कृत्रिम ठंडक’ भी समाप्त होगी, जिससे वास्तविक तापमान तेजी से बढ़ सकता है। यह स्थिति भविष्य में गर्मी के और अधिक तीव्र होने का संकेत देती है।
श्रमिक वर्ग पर बढ़ता खतरा
देश की बड़ी आबादी ऐसे क्षेत्रों में कार्यरत है, जहां उन्हें सीधे तौर पर गर्मी का सामना करना पड़ता है। कृषि, निर्माण और असंगठित क्षेत्र के करोड़ों श्रमिकों के लिए यह स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है। तापमान में संभावित वृद्धि से उनकी कार्यक्षमता, स्वास्थ्य और आय पर गंभीर प्रभाव पड़ने की आशंका जताई गई है।
अनुकूलन क्षमता में असमानता
देश में अभी भी अधिकांश घरों में आधुनिक शीतलन सुविधाओं का अभाव है। बहुत कम प्रतिशत परिवारों के पास ही एयर कंडीशनर जैसी सुविधा उपलब्ध है। ऐसे में बढ़ती गर्मी से निपटने के लिए बड़ी आबादी पारंपरिक और सीमित उपायों पर निर्भर है, जो भविष्य की तीव्र गर्मी के सामने अपर्याप्त साबित हो सकते हैं।
वर्षा पैटर्न में भी बड़े बदलाव की आशंका
जलवायु मॉडल यह संकेत दे रहे हैं कि भविष्य में भारत में वर्षा की मात्रा में भी बड़ा बदलाव हो सकता है। कुछ अनुमानों के अनुसार सदी के अंत तक वर्षा में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है, जिससे कृषि और जल प्रबंधन दोनों पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा। यह स्थिति किसानों के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर सकती है।
भविष्य के लिए चेतावनी और तैयारी की जरूरत
यह शोध स्पष्ट करता है कि भारत में गर्मी का सबसे कठिन दौर अभी आना बाकी है। वर्तमान परिस्थितियों को देखकर यदि तैयारी नहीं की गई, तो आने वाले वर्षों में इसका प्रभाव और गंभीर हो सकता है। इसलिए जरूरी है कि जलवायु अनुकूलन की रणनीतियों को समय रहते मजबूत किया जाए और समाज के हर वर्ग को इसके लिए तैयार किया जाए।