नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि हर नागरिक को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार प्राप्त है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल सेक्स वर्क करने के कारण किसी वयस्क व्यक्ति को अपराधी की तरह नहीं देखा जा सकता। न्यायालय ने यह भी कहा कि कानून लागू करने वाली एजेंसियों को ऐसे मामलों में मानवाधिकारों और संवैधानिक मूल्यों का सम्मान करना चाहिए।
कानून का उद्देश्य सजा नहीं, शोषण रोकना है
अदालत ने ‘इम्मोरल ट्रैफिक (प्रिवेंशन) एक्ट’ का विश्लेषण करते हुए कहा कि इस कानून का मूल उद्देश्य स्वेच्छा से काम करने वाले वयस्कों को दंडित करना नहीं है। इसका वास्तविक मकसद मानव तस्करी, जबरन देह व्यापार, धोखाधड़ी और शोषण जैसी अवैध गतिविधियों को रोकना है। यदि किसी व्यक्ति को दबाव, लालच या धोखे से इस पेशे में धकेला जाता है, तो वह गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है और कानून उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की अनुमति देता है।
सहमति आधारित सेक्स वर्क और तस्करी में स्पष्ट अंतर
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह महत्वपूर्ण अंतर रेखांकित किया कि वयस्कों के बीच आपसी सहमति से किया गया सेक्स वर्क और मानव तस्करी या जबरन शोषण एक समान नहीं हैं। अदालत के अनुसार, दोनों को एक ही नजरिए से देखना कानून की भावना के विपरीत होगा। इसलिए जांच और कार्रवाई करते समय इस अंतर को समझना जरूरी है।
वेश्यालय संचालन और दलाली अब भी दंडनीय
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि सभी संबंधित गतिविधियां कानूनी हो गई हैं। वेश्यालय चलाना, किसी स्थान को इस उद्देश्य के लिए उपलब्ध कराना, किसी अन्य व्यक्ति की कमाई पर निर्भर रहना या किसी को इस कार्य में लाने के लिए प्रेरित करना अब भी कानूनन अपराध है। ऐसे मामलों में पहले की तरह ही कानूनी कार्रवाई जारी रहेगी।
सार्वजनिक स्थानों के आसपास गतिविधियों पर रोक बरकरार
कानून के तहत स्कूलों, अस्पतालों, धार्मिक स्थलों और अन्य सार्वजनिक स्थानों के आसपास इस प्रकार की गतिविधियां प्रतिबंधित हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से इन प्रावधानों में कोई बदलाव नहीं हुआ है। इन नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कार्रवाई जारी रहेगी।
अनुच्छेद 21 के तहत अधिकारों की पुष्टि
अदालत ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए कहा कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार सभी नागरिकों को समान रूप से प्राप्त है। इसमें सेक्स वर्कर्स भी शामिल हैं। न्यायालय ने कहा कि उन्हें भी सुरक्षा, सम्मान और कानूनी संरक्षण का वही अधिकार है जो किसी अन्य नागरिक को प्राप्त है।
संवेदनशीलता के साथ कानून लागू करने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस और प्रशासनिक एजेंसियों को निर्देश दिया कि वे स्वेच्छा से सेक्स वर्क करने वाले वयस्कों के प्रति पूर्वाग्रहपूर्ण रवैया न अपनाएं। कानून का इस्तेमाल केवल उन मामलों में किया जाए जहां शोषण, तस्करी, दबाव या अन्य अवैध गतिविधियों के प्रमाण मौजूद हों। अदालत ने मानव गरिमा और संवेदनशीलता को कानून प्रवर्तन का महत्वपूर्ण आधार बताया।