अयोध्या. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी ने रविवार को आयोजित एक प्रेस वार्ता में अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट तथा मंदिर निर्माण से जुड़े विभिन्न पहलुओं को लेकर केंद्र सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि मामला केवल कथित चढ़ावे की अनियमितताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि मंदिर निर्माण की प्रक्रिया और भूमि खरीद से जुड़े कुछ मामलों की भी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित करने की मांग करते हुए कहा कि यदि सभी प्रक्रियाएं नियमों के अनुरूप हुई हैं तो स्वतंत्र जांच से तथ्य स्वतः स्पष्ट हो जाएंगे। उल्लेखनीय है कि यह मांग कांग्रेस की ओर से सार्वजनिक रूप से उठाई गई है और आरोपों की आधिकारिक पुष्टि किसी सक्षम जांच एजेंसी द्वारा अभी तक नहीं की गई है।
भूमि सौदों और कथित वित्तीय अनियमितताओं का किया उल्लेख
प्रमोद तिवारी ने अपने वक्तव्य में दावा किया कि मंदिर निर्माण के दौरान कुछ भूमि सौदों में गंभीर वित्तीय अनियमितताएं हुईं। उन्होंने आरोप लगाया कि एक भूमि, जिसे लगभग दो करोड़ रुपये में खरीदा गया था, उसे कुछ ही समय बाद कहीं अधिक कीमत पर बेचे जाने का मामला सामने आया। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ अन्य भूमि खरीद में प्रचलित सर्किल दर से काफी अधिक मूल्य का भुगतान किए जाने के आरोप पहले भी सार्वजनिक चर्चा का विषय रहे हैं। कांग्रेस नेता का कहना था कि इन सभी लेनदेन की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराई जानी चाहिए, ताकि यदि कोई अनियमितता हुई हो तो उसकी जिम्मेदारी तय की जा सके। हालांकि इन आरोपों पर संबंधित ट्रस्ट अथवा सरकारी पक्ष की ओर से इस संदर्भ में कोई नई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
ट्रस्ट के गठन और संरचना को लेकर भी उठाए प्रश्न
कांग्रेस नेता ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की संरचना पर भी प्रश्न उठाए। उनका आरोप था कि ट्रस्ट में पारंपरिक धार्मिक प्रतिनिधित्व के स्थान पर कुछ ऐसे व्यक्तियों को प्रमुख भूमिका दी गई, जिनका संबंध भारतीय जनता पार्टी अथवा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से बताया जाता है। उन्होंने कहा कि यदि ट्रस्ट का गठन सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप केंद्र सरकार द्वारा किया गया था, तो उसके कार्यों और निर्णयों की जवाबदेही भी स्पष्ट होनी चाहिए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि धार्मिक संस्थाओं की संरचना और प्रशासन को लेकर समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक दल अपनी अलग-अलग राय व्यक्त करते रहे हैं, किंतु ऐसे मामलों में अंतिम निष्कर्ष तथ्यों और वैधानिक प्रक्रियाओं के आधार पर ही स्थापित होते हैं।
प्राण प्रतिष्ठा और मंदिर निर्माण प्रक्रिया पर भी व्यक्त की आपत्ति
प्रमोद तिवारी ने यह भी आरोप लगाया कि भगवान श्रीरामलला की प्राण प्रतिष्ठा उस समय संपन्न कराई गई, जब मंदिर निर्माण का संपूर्ण कार्य अभी पूरा नहीं हुआ था। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि उनकी दृष्टि में मंदिर निर्माण का मार्ग सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय के बाद प्रशस्त हुआ और उसी के अनुरूप पूरी प्रक्रिया आगे बढ़ी। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी पर राम मंदिर के मुद्दे के राजनीतिक उपयोग का आरोप भी लगाया। उल्लेखनीय है कि प्राण प्रतिष्ठा समारोह को लेकर विभिन्न धार्मिक विद्वानों, संतों और राजनीतिक दलों की अलग-अलग राय सामने आती रही है। ऐसे विषय धार्मिक परंपराओं, प्रशासनिक तैयारियों और सामाजिक दृष्टिकोण से भी जुड़े होते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एसआईटी जांच की मांग
कांग्रेस नेता ने कहा कि यदि ट्रस्ट और मंदिर निर्माण से जुड़े सभी निर्णय पूरी पारदर्शिता और नियमों के अनुरूप हुए हैं, तो सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में विशेष जांच दल द्वारा जांच कराए जाने में किसी प्रकार की आपत्ति नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कथित चढ़ावे से जुड़े मामलों, भूमि लेनदेन तथा निर्माण प्रक्रिया से संबंधित सभी आरोपों की निष्पक्ष जांच कराने की मांग दोहराई। साथ ही उन्होंने यह भी प्रश्न उठाया कि यदि सब कुछ पूरी तरह व्यवस्थित था, तो ट्रस्ट से जुड़े कुछ पदाधिकारियों के इस्तीफों के पीछे क्या कारण रहे। हालांकि इन दावों के संबंध में किसी सक्षम जांच एजेंसी द्वारा अभी तक कोई निष्कर्ष सार्वजनिक नहीं किया गया है और न ही इन आरोपों पर न्यायिक स्तर पर कोई अंतिम निर्णय सामने आया है।
आरोपों की पुष्टि शेष, आधिकारिक जांच या प्रतिक्रिया का रहेगा महत्व
राम मंदिर देश की आस्था, संवैधानिक प्रक्रिया और सामाजिक महत्व से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील विषय है। ऐसे मामलों में सार्वजनिक जीवन से जुड़े व्यक्तियों द्वारा लगाए गए आरोपों की पुष्टि केवल सक्षम जांच एजेंसियों अथवा न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही हो सकती है। इसलिए कांग्रेस नेता द्वारा लगाए गए आरोप फिलहाल उनके राजनीतिक वक्तव्य के रूप में ही देखे जा रहे हैं। यदि भविष्य में इस विषय पर कोई आधिकारिक जांच, न्यायालय का निर्देश या श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट अथवा केंद्र सरकार की विस्तृत प्रतिक्रिया सामने आती है, तो उससे इस पूरे प्रकरण की स्थिति और अधिक स्पष्ट हो सकेगी। लोकतांत्रिक व्यवस्था में सार्वजनिक संस्थाओं की पारदर्शिता और जवाबदेही जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही आवश्यक यह भी है कि किसी भी आरोप का मूल्यांकन प्रमाण, वैधानिक प्रक्रिया और न्यायिक परीक्षण के आधार पर किया जाए।