उत्तरकाशी जनपद के विकासखंड डुंडा स्थित वीरपुर गांव पारंपरिक ऊनी वस्त्र उद्योग के लिए तेजी से पहचान बना रहा है। यहां किन्नौरी जाड़ भोटिया और खाम्पा समाज के करीब 300 परिवार पीढ़ियों से भेड़ पालन कर उनकी ऊन से अलग-अलग डिजाइन के गर्म वस्त्र तैयार कर रहे हैं। गांव में बनाए जाने वाले कोट स्वेटर मफलर टोपी सॉल और जुराब की सर्दियों में विशेष मांग रहती है।
बाहरी जगहों पर अत्यधिक डिमांड
स्थानीय बाजारों के अलावा पौड़ी चमोली टिहरी जैसे जनपद के अन्य राज्यों के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर के कारगिल और लद्दाख जैसे अत्यधिक ठंडे क्षेत्रों से भी यहां के ऊनी वस्त्रों के ऑर्डर मिल रहे हैं। साथ ही चार धामों में भी लगातार कार्य करते रहते हैं अच्छी मांग के कारण कारीगरों को इस व्यवसाय से प्रतिमाह लगभग 15 से 20 हजार रुपये तक की आय हो रही है जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़ रहे हैं। सीमांत ग्रामोद्योग संस्थान से जुड़े वूलन वस्त्र व्यवसायी कमल सिंह ने बताया कि यह उनका पैतृक कार्य है जिसे उन्होंने समय के साथ आगे बढ़ाया है।
शुरुआत में उन्होंने बैंक से 50 हजार रुपये की लिमिट लेकर काम शुरू किया था लेकिन कारोबार बढ़ने के साथ अब 10 लाख रुपये की लिमिट लेकर अपने उद्योग का और विस्तार किया है जिससे उनकी सालाना व्यवसाय 35 लाख तक पहुंच गया है। उनके उद्योग से करीब 20 से 25 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार भी मिला हुआ है और गांव के कारीगरों द्वारा तैयार किए गए ऊनी उत्पाद अब इनके द्वारा खरीदे जाते हैं जिससे उन्हें अपने सामान को बेचने के लिए दूर-दराज के बाजारों में जाने की आवश्यकता नहीं पड़ रही है। साथ ही मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य सरकार द्वारा सरकारी कार्यक्रमों में सम्मान के लिए स्थानीय हस्तशिल्प से बने सॉल और समेत अन्य उत्पादों के उपयोग करने का निर्णय लिया है इससे पारंपरिक उद्योग को नई पहचान और प्रोत्साहन देने में महत्वपूर्ण साबित हो रहा है।
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