पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों की सरगर्मी बढ़ते ही डिजिटल कैंपेन की बाढ़ आ गई है, लेकिन बंगाल की गलियों में दीवारों पर उकेरे गए राजनीतिक कार्टून और स्लोगन आज भी अपनी अहमियत बनाए हुए हैं। जहाँ एक तरफ सोशल मीडिया पर हैशटैग की लड़ाई चल रही है, वहीं दूसरी ओर 'वॉल राइटिंग' के जरिए मनोवैज्ञानिक बढ़त बनाने की होड़ भी जारी है।
समर्पण बनाम पेशेवर काम
भाजपा प्रवक्ता पृथ्वीराज मुखर्जी का कहना है कि उनकी पार्टी में यह काम सदस्य अपनी मर्जी और लगन से करते हैं, जिसके लिए कोई भुगतान नहीं लिया जाता। वे इसे "बंगाल की राजनीतिक विरासत" मानते हैं। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस (TMC) के समर्थक और व्यवसायी सैबल डे स्वीकार करते हैं कि वे प्रोफेशनल पेंटर्स की मदद लेते हैं और पार्टी इसके लिए भुगतान करती है, विशेषकर सरकारी योजनाओं के प्रचार के लिए।
बदलते दौर की हकीकत
15 वर्षों से इस क्षेत्र में सक्रिय स्कूल शिक्षक अमित दास का नज़रिया थोड़ा अलग है। उनके अनुसार, अब यह काम केवल शौक नहीं रहा, बल्कि इसमें पेशेवर पहलू भी जुड़ गया है और पेंटर्स को उनके काम के पैसे मिलते हैं। वहीं, वामपंथी खेमे के अरिजीत चौधरी 1989 के दौर को याद करते हुए बताते हैं कि कैसे CPI(M) वर्कशॉप आयोजित कर कार्यकर्ताओं को ब्रश पकड़ने और कैलीग्राफी की बारीकियां सिखाती थी। डिजिटल पोस्टरों के इस युग में भी, बंगाल की दीवारों पर बना 'वॉल आर्ट' आज भी राजनीतिक अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त और पारंपरिक माध्यम बना हुआ है।