भारत में खाद्य तेलों का आयात मई 2026 के दौरान उल्लेखनीय बढ़ोतरी के साथ सामने आया है। उद्योग संगठन सॉल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के आंकड़ों के अनुसार, देश का खाद्य तेल आयात पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 6.7 प्रतिशत बढ़कर लगभग 13.39 लाख टन तक पहुंच गया। यह वृद्धि ऐसे समय में दर्ज हुई है जब घरेलू बाजार में खाद्य तेलों की मांग लगातार बनी हुई है और विभिन्न तेलों की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आयात में हुई यह बढ़ोतरी देश की उपभोग आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आवश्यक आपूर्ति सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत देती है।
सोयाबीन तेल बना आयात वृद्धि का सबसे बड़ा आधार
मई महीने में आयात बढ़ने का सबसे प्रमुख कारण कच्चे सोयाबीन तेल की मांग में तेज वृद्धि रही। आंकड़ों के अनुसार कच्चे सोयाबीन तेल का आयात पिछले वर्ष के लगभग 3.99 लाख टन से बढ़कर करीब 4.94 लाख टन तक पहुंच गया। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी प्रतिस्पर्धी कीमतों ने आयातकों को अधिक मात्रा में सोयाबीन तेल खरीदने के लिए प्रोत्साहित किया। बाजार विशेषज्ञों के अनुसार पाम तेल की तुलना में सोयाबीन तेल की मूल्य प्रतिस्पर्धात्मकता ने व्यापारियों की प्राथमिकताओं को प्रभावित किया, जिसका सीधा असर आयात आंकड़ों में दिखाई दिया।
कुल वनस्पति तेल आयात में भी दर्ज हुई उल्लेखनीय वृद्धि
खाद्य और गैर-खाद्य दोनों श्रेणियों को मिलाकर देश का कुल वनस्पति तेल आयात मई 2026 में लगभग 13.65 लाख टन रहा। यह पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में लगभग 8 प्रतिशत अधिक है। वनस्पति तेल आयात में लगातार वृद्धि इस बात का संकेत है कि देश में खाद्य प्रसंस्करण, घरेलू उपभोग और औद्योगिक उपयोग की मांग मजबूत बनी हुई है। भारत विश्व के सबसे बड़े खाद्य तेल आयातकों में शामिल है और घरेलू उत्पादन एवं मांग के बीच अंतर को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर रहता है।
तेल वर्ष के सात महीनों में आयात ने बनाया नया रिकॉर्ड
नवंबर 2025 से मई 2026 तक के तेल वर्ष के पहले सात महीनों के आंकड़े भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्शाते हैं। इस अवधि में कुल वनस्पति तेल आयात लगभग 12 प्रतिशत बढ़कर 93.65 लाख टन तक पहुंच गया। इसी अवधि में खाद्य तेल आयात 13 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 92.17 लाख टन दर्ज किया गया। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि देश में खाद्य तेलों की खपत लगातार बढ़ रही है और बाजार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आयात का महत्व बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती आबादी, खाद्य उद्योग के विस्तार और बदलती उपभोक्ता आदतों का भी इसमें महत्वपूर्ण योगदान है।
सरकारी शुल्क नीति का दिख रहा स्पष्ट प्रभाव
सरकार द्वारा आयात शुल्क और शुल्क मूल्य में किए गए बदलावों का असर भी तेल व्यापार पर दिखाई दे रहा है। एक जून से कच्चे पाम तेल और रिफाइंड पाम तेल के शुल्क मूल्य में वृद्धि की गई, जबकि कच्चे सोयाबीन तेल पर शुल्क मूल्य अपेक्षाकृत कम रखा गया। इस नीति ने आयातकों को सोयाबीन तेल की ओर अधिक आकर्षित किया। आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि शुल्क संरचना में बदलाव अक्सर व्यापारिक निर्णयों को प्रभावित करते हैं और वर्तमान परिदृश्य में भी यही स्थिति देखने को मिली है।
घरेलू रिफाइनिंग उद्योग को मिल रहा बढ़ावा
सरकार की नीति का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य घरेलू रिफाइनिंग उद्योग को मजबूत बनाना भी है। कच्चे और रिफाइंड तेल के बीच बनाए गए शुल्क अंतर के कारण आयातकों की प्राथमिकता कच्चे तेल की ओर बढ़ी है, जिससे देश के रिफाइनिंग उद्योग को अधिक अवसर मिल रहे हैं। इससे घरेलू प्रसंस्करण क्षमता का बेहतर उपयोग हो रहा है और रोजगार सृजन को भी बढ़ावा मिल रहा है। उद्योग जगत का मानना है कि यह रणनीति दीर्घकाल में आत्मनिर्भरता और औद्योगिक विकास दोनों के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकती है।
रिफाइंड तेल आयात में आई बड़ी गिरावट
तेल वर्ष के दौरान रिफाइंड पामोलीन के आयात में भारी गिरावट दर्ज की गई है। नवंबर 2025 से मई 2026 के बीच इसका आयात घटकर लगभग 47 हजार टन रह गया, जबकि पिछले वर्ष समान अवधि में यह 8 लाख टन से अधिक था। यह परिवर्तन दर्शाता है कि आयातक अब रिफाइंड उत्पादों के बजाय कच्चे तेलों को प्राथमिकता दे रहे हैं। परिणामस्वरूप कुल आयात में कच्चे तेलों की हिस्सेदारी बढ़कर 97 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जबकि रिफाइंड तेलों की हिस्सेदारी घटकर मात्र 3 प्रतिशत रह गई है।
बदलते वैश्विक बाजार के बीच भारत की रणनीतिक तैयारी
वैश्विक खाद्य तेल बाजार में लगातार बदलती परिस्थितियों के बीच भारत अपनी आयात रणनीति को परिस्थितियों के अनुरूप ढालता दिखाई दे रहा है। बढ़ती मांग, अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव और सरकारी नीतियों का संयुक्त प्रभाव खाद्य तेल व्यापार की दिशा तय कर रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में भी सोयाबीन तेल और अन्य प्रमुख खाद्य तेलों की कीमतों तथा आयात रुझानों पर बाजार की करीबी नजर बनी रहेगी। देश की खाद्य सुरक्षा और उपभोक्ता हितों को ध्यान में रखते हुए यह क्षेत्र आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बना रहेगा।