पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक कच्चे तेल बाजार में भारी अस्थिरता देखने को मिल रही है। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित किया है। कई देशों ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 30 प्रतिशत तक वृद्धि कर दी है, लेकिन भारत में अभी तक आम उपभोक्ताओं पर सीधा बोझ नहीं डाला गया है। हालांकि इसके पीछे सरकारी तेल कंपनियों पर लगातार बढ़ता आर्थिक दबाव बड़ी चिंता बनता जा रहा है।
हर दिन हजारों करोड़ का झटका
रिपोर्ट्स के अनुसार भारत की सरकारी तेल कंपनियों को प्रतिदिन लगभग 700 से 1000 करोड़ रुपये तक का नुकसान उठाना पड़ रहा है। महीने के स्तर पर यह आंकड़ा करीब 30 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहीं, तो घरेलू स्तर पर भी पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाने की नौबत आ सकती है।
कच्चे तेल और गैस की सप्लाई पर असर
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के कारण देश के लगभग 40 प्रतिशत कच्चे तेल, 90 प्रतिशत एलपीजी और 65 प्रतिशत नैचुरल गैस आयात पर दबाव बढ़ा है। यही नैचुरल गैस बिजली उत्पादन, खाद निर्माण, CNG और घरेलू पाइप गैस आपूर्ति में इस्तेमाल होती है। ऐसे में आपूर्ति श्रृंखला में किसी भी प्रकार की बाधा का असर व्यापक स्तर पर दिखाई दे सकता है।
तेल कंपनियों पर बढ़ता आर्थिक बोझ
इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड जैसी सरकारी तेल कंपनियां पिछले कई हफ्तों से बिना कीमत बढ़ाए लगातार ईंधन आपूर्ति बनाए हुए हैं। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय तक इस तरह की अंडर-रिकवरी कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर गंभीर असर डाल सकती है।
उपभोक्ताओं को फिलहाल राहत, लेकिन कब तक?
सरकार और तेल कंपनियों ने अब तक आम जनता को तत्काल राहत देने की कोशिश की है, ताकि बढ़ती महंगाई का दबाव और न बढ़े। लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंची बनी रहने पर यह राहत लंबे समय तक जारी रखना आसान नहीं माना जा रहा। आर्थिक जानकारों का कहना है कि यदि हालात नहीं सुधरे, तो आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में संशोधन संभव है।
वैश्विक बाजार में बढ़ती अनिश्चितता
विशेषज्ञों के अनुसार होर्मुज जलडमरूमध्य और पश्चिम एशिया क्षेत्र में किसी बड़े सैन्य टकराव की स्थिति वैश्विक ऊर्जा बाजार को और अधिक अस्थिर बना सकती है। यह क्षेत्र दुनिया की बड़ी तेल आपूर्ति का केंद्र माना जाता है। ऐसे में यहां किसी भी प्रकार की रुकावट अंतरराष्ट्रीय कीमतों को तेजी से प्रभावित कर सकती है, जिसका असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर भी पड़ेगा।
महंगाई पर भी पड़ सकता है व्यापक असर
यदि पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी होती है, तो इसका असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहेगा। परिवहन लागत बढ़ने से खाद्य पदार्थों, दैनिक उपयोग की वस्तुओं और उद्योगों पर भी असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा संकट का सीधा संबंध महंगाई और आर्थिक गतिविधियों से जुड़ा होता है, इसलिए आने वाले समय में सरकार के सामने संतुलन बनाए रखना बड़ी चुनौती बन सकता है।