ये रहीं कम अंतर से जीतने की वजह
पहली वजह: भार्गव के नामांकन ने ही क्षेत्र में भाजपा के भीतर विद्रोह की शुरुआत कर दी। हालांकि एमपी मार्कफेड के पूर्व अध्यक्ष रमाकांत भार्गव को चौहान का करीबी माना जाता है, लेकिन केंद्रीय मंत्री के एक और वफादार राजेंद्र सिंह राजपूत, जिन्होंने 2006 में चौहान के लिए अपनी सीट छोड़ दी थी, उम्मीदवारी से नाराज थे।
दूसरी वजह: राजपूत और उनके समर्थकों ने भार्गव के नामांकन का खुलकर विरोध किया और यहां तक कि उम्मीदवार नहीं बदले जाने पर कांग्रेस पार्टी को वोट देने की धमकी भी दी। राजपूत के समर्थकों ने दावा किया कि चूंकि उन्होंने चौहान के लिए सीट छोड़ी थी, इसलिए अब पूर्व सीएम की बारी है कि वे सीट उन्हें लौटाएं। उन्होंने पार्टी की बैठकों का बहिष्कार किया, यहां तक कि चौहान द्वारा आयोजित बैठकों का भी।
तीसरी वजह: इस निर्वाचन क्षेत्र में ओबीसी (विशेष रूप से किरार) समुदाय के मतदाता भी प्रमुख हैं। चूंकि चौहान किरार हैं, इसलिए उन्होंने उन्हें वोट दिया, लेकिन अब लगता है कि इसका एक बड़ा हिस्सा पटेल के पास चला गया। उन्होंने 1993 में यहां जीत हासिल की थी। वे खुद भी किरार समाज से हैं। भाजपा की जीत के अंतर में कमी का एक और कारण भार्गव का लोगों से संपर्क में न होना है।
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