भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद यानी आईसीएसएसआर ने भारत में हो रहे जनसांख्यिकीय बदलावों के व्यापक अध्ययन के लिए शोधपत्र आमंत्रित किए हैं। परिषद की पत्रिका ‘इंडियन सोशल साइंस रिव्यू’ के विशेषांक का विषय ‘भारत के जनसांख्यिकीय बदलाव को समझना: रुझान, संक्रमण और नीतिगत दृष्टिकोण’ रखा गया है। इस विशेषांक के माध्यम से देश की बदलती जनसंख्या संरचना, उसके सामाजिक और आर्थिक प्रभाव तथा भविष्य की नीतिगत चुनौतियों पर गहन अध्ययन को बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है। परिषद ने इसके लिए कुल 18 व्यापक विषय निर्धारित किए हैं, जिन पर शोधकर्ताओं से मौलिक और नीतिगत दृष्टि से उपयोगी शोधपत्र मांगे गए हैं।
धार्मिक परिवर्तन और जनसांख्यिकी भी प्रमुख विषय
शोध के लिए निर्धारित विषयों में धार्मिक परिवर्तन और जनसांख्यिकीय गतिशीलता को भी प्रमुख स्थान दिया गया है। इसके साथ ही सीमा-पार प्रवासन, सीमा प्रबंधन और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों को भी शोध के दायरे में शामिल किया गया है। परिषद ने स्वदेशी आबादी और जनसांख्यिकी में सामाजिक विविधता को भी महत्वपूर्ण अध्ययन क्षेत्र माना है। इसके अलावा डिजिटल समाज और जनसांख्यिकीय आंकड़ा प्रणालियों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की भूमिका पर भी शोध आमंत्रित किया गया है। इन विषयों का चयन यह संकेत देता है कि भारत की जनसंख्या में हो रहे बदलावों को केवल संख्या के नजरिए से नहीं, बल्कि सामाजिक, तकनीकी, प्रशासनिक और सुरक्षा से जुड़े व्यापक संदर्भ में समझने पर जोर दिया जा रहा है।
प्रवासन से वृद्धावस्था और प्रजनन तक कई आयाम
विशेषांक के लिए शोध के दायरे को काफी व्यापक रखा गया है। इसमें जनसंख्या की गतिशीलता और जनसांख्यिकीय संक्रमण, जनसंख्या नीति और जनगणना प्रणाली, तुलनात्मक एवं अंतरराष्ट्रीय जनसांख्यिकी तथा बढ़ती आबादी में वृद्धावस्था जैसे विषय शामिल हैं। प्रजनन और परिवार निर्माण, प्रवासन एवं शहरीकरण, श्रम बाजार में बदलाव और मानव पूंजी से जुड़े पहलुओं पर भी शोध को प्रोत्साहित किया जाएगा। स्वास्थ्य और पोषण तथा जनसंख्या और पर्यावरण के बीच संबंध भी इस अध्ययन का हिस्सा होंगे। इस व्यापक दायरे के जरिए परिषद भारत की जनसंख्या संरचना में हो रहे बदलावों के कारणों और उनके दूरगामी प्रभावों को समझने की कोशिश कर रही है।
नीतियों और विकास के लिए शोध को उपयोगी बनाने पर जोर
आईसीएसएसआर के अनुसार, विशेषांक का उद्देश्य ऐसे नवोन्मेषी और नीतिगत रूप से उपयोगी शोध को सामने लाना है, जो भारत के बदलते जनसांख्यिकीय परिदृश्य को बेहतर ढंग से समझने में मदद कर सके। जनसंख्या में बदलाव का असर परिवार, समाज, अर्थव्यवस्था, शासन और राष्ट्रीय विकास के विभिन्न क्षेत्रों पर पड़ता है। ऐसे में शोधकर्ताओं से अपेक्षा की जा रही है कि वे केवल आंकड़ों का विश्लेषण करने के बजाय इन बदलावों के सामाजिक और नीतिगत परिणामों पर भी प्रकाश डालें। परिषद का मानना है कि इस प्रकार का बहुआयामी अध्ययन वर्ष 2047 तक विकसित भारत के व्यापक लक्ष्य के संदर्भ में भी उपयोगी साबित हो सकता है।
शोधकर्ताओं को मिलेगी अंतरविषयक मंच की सुविधा
आईसीएसएसआर के सदस्य सचिव धनंजय सिंह ने 17 अगस्त को सोशल मीडिया पर जानकारी साझा करते हुए कहा था कि पत्रिका का यह विशेषांक भारत के जनसांख्यिकीय परिवर्तन के कारणों, स्वरूप और परिणामों के अध्ययन के लिए अंतरविषयक मंच उपलब्ध कराएगा। इस मंच पर समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र, जनसंख्या अध्ययन, शासन, स्वास्थ्य, पर्यावरण और प्रौद्योगिकी जैसे अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े शोध को एक साथ लाने की संभावना है। इससे भारत में जनसंख्या बदलाव को किसी एक विषय तक सीमित रखने के बजाय विभिन्न क्षेत्रों के परस्पर संबंधों के आधार पर समझने में मदद मिल सकती है। खास तौर पर प्रवासन, वृद्धावस्था, परिवार संरचना और डिजिटल तकनीक जैसे तेजी से बदलते क्षेत्रों में ऐसे शोध भविष्य की नीतियों के लिए महत्वपूर्ण आधार तैयार कर सकते हैं।
24 अगस्त को जारी होंगी दिशानिर्देश, 21 नवंबर तक आवेदन
आईसीएसएसआर की ओर से शोधपत्र प्रस्तुत करने से संबंधित विस्तृत दिशानिर्देश 24 अगस्त को जारी किए जाने हैं। ऑनलाइन शोधपत्र जमा करने की अंतिम तारीख 21 नवंबर निर्धारित की गई है। शोधकर्ताओं के लिए यह विशेषांक भारत में हो रहे जनसांख्यिकीय बदलावों से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों पर अपने अध्ययन और निष्कर्ष सामने रखने का अवसर प्रदान करेगा। धार्मिक परिवर्तन और सामाजिक विविधता से लेकर प्रवासन, जनसंख्या नीति और कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक विषयों की विविधता इसे व्यापक दायरे वाला शोध मंच बनाती है। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि देशभर के शोधकर्ता इन विषयों को किस दृष्टिकोण से देखते हैं और उनके अध्ययन से भारत की भविष्य की सामाजिक एवं विकास नीतियों के लिए कौन-से नए निष्कर्ष सामने आते हैं।