कोलकाता डेस्क: दुनिया के दो सबसे बड़े हिमखंडों—अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड—से अनवरत बर्फ पिघलने का सिलसिला जारी है, जिससे वैश्विक स्तर पर तटीय क्षेत्रों में बड़े संकट की आहट सुनाई दे रही है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय पत्रिका 'साइंटिफिक डेटा' (Scientific Data) में प्रकाशित एक विस्तृत रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने खुलासा किया है कि बीते 47 वर्षों (1972/1979 से अब तक) में इन दोनों हिमखंडों से 12 लाख करोड़ टन से अधिक बर्फ पिघलकर समुद्र में समा चुकी है। इस भारी बर्फबारी के पिघलने से समुद्र का जलस्तर 31.4 मिलीमीटर बढ़ गया है।विश्व के शीर्ष संस्थानों के 58 वैज्ञानिकों द्वारा 27 उपग्रहों के आंकड़ों और 42 अलग-अलग अध्ययनों के विश्लेषण से तैयार यह रिपोर्ट अब तक का सबसे सटीक और विश्वसनीय आकलन माना जा रहा है।
दो विशाल हिमखंडों की वर्तमान स्थिति
अंटार्कटिका महाद्वीप का बर्फ से ढका क्षेत्रफल लगभग 1.40 करोड़ वर्ग किलोमीटर है, जहां बर्फ का कुल आयतन 2.27 करोड़ से 3 करोड़ घन किलोमीटर के बीच अनुमानित है। वहीं दूसरी ओर, ग्रीनलैंड का लगभग 80 प्रतिशत भूभाग (17 लाख वर्ग किलोमीटर) बर्फ की मोटी परतों से ढका हुआ है, जिसमें कुल 29 लाख घन किलोमीटर बर्फ जमा है। हालांकि, बीते पांच दशकों में बढ़ते तापमान के कारण इन दोनों प्राकृतिक सुरक्षा कवचों को भारी नुकसान पहुंचा है।
उपग्रह डेटा और 5 दशकों के अध्ययन का निष्कर्ष
अनुसंधान दल ने इस विस्तृत अध्ययन के लिए ग्रीनलैंड के आंकड़े 1972 से और अंटार्कटिका के उपग्रह चित्र 1979 से एकत्र किए हैं। वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि इस रिपोर्ट में केवल उसी पिघली हुई बर्फ की गणना की गई है जिसने सीधे तौर पर समुद्र के जलस्तर को बढ़ाया है। बर्फ की परतों का पतला होना या समुद्र की तलहटी में बर्फ के क्षरण से पैदा हुए हिम-घाटे को इसमें शामिल नहीं किया गया है।

ग्लेशियरों का असंतुलन: 84 प्रतिशत पिघलन का मुख्य कारण
ब्रिटेन की नॉर्थम्ब्रिया यूनिवर्सिटी की हिमनद विज्ञानी (Glaciologist) और इस रिपोर्ट की मुख्य लेखिकाओं में से एक डॉ. इनेस ओतोसाका के अनुसार, बर्फ पिघलने की 84 प्रतिशत मुख्य वजह ग्लेशियरों की गतिशीलता में असंतुलन होना है। जब ग्लेशियर सीधे गर्म समुद्र के पानी के संपर्क में आते हैं, तो उनके पिघलने की गति अत्यधिक तेज हो जाती है। इसके अलावा, शेष 16 प्रतिशत बर्फ वायुमंडलीय तापमान में वृद्धि के कारण पिघल रही है।
ग्रीनलैंड में 'अटलांटिफिकेशन' और अंटार्कटिका की महासागरीय धाराएं
वैज्ञानिकों ने आगाह किया है कि ग्रीनलैंड में 'अटलांटिफिकेशन' (Atlantification) की प्रक्रिया तेजी से बढ़ रही है। इसके तहत अटलांटिक महासागर का गर्म पानी उत्तर दिशा की ओर प्रवेश कर रहा है, जो दुनिया के दूसरे सबसे बड़े हिमखंड को अंदर से कमजोर कर रहा है। इसी प्रकार, दक्षिण में अंटार्कटिका के पास ध्रुवीय महासागरीय धाराएं तीव्र हो रही हैं। ये धाराएं ग्लेशियरों की गहराई तक पहुंचकर उन्हें कई दिशाओं से तापीय दबाव दे रही हैं। यह प्रवृत्ति 1990 के दशक के बाद से काफी बढ़ी है।
2020-2023 के बीच अस्थायी स्थिरता और फिर से बढ़ता संकट
अध्ययन में पाया गया कि वर्ष 2020 से 2023 के बीच अंटार्कटिक प्रायद्वीप में बर्फ पिघलने की दर में मामूली गिरावट दर्ज की गई थी। हालांकि, यह स्थिरता बेहद सामयिक थी, जिसका मुख्य कारण पूर्वी अंटार्कटिका में हुई रिकॉर्ड बर्फबारी थी। वैज्ञानिक इसे मौसम का एक अल्पकालिक बदलाव मान रहे हैं। 2023 के बाद के उपग्रह आंकड़ों से संकेत मिलता है कि बर्फ पिघलने की प्रक्रिया ने पुनः रफ्तार पकड़ ली है।
ग्लोबल वॉर्मिंग और ग्रीनहाउस गैसों का घातक प्रभाव
इस मानवीय व पर्यावरणीय त्रासदी की मूल जड़ में अनियंत्रित ग्लोबल वॉर्मिंग और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन है। वातावरण में जमा हो रहीं हानिकारक गैसों के कारण पृथ्वी के जीवमंडल में लगातार अतिरिक्त ऊष्मा संचित हो रही है। इस ऊष्मा को महासागर अवशोषित कर रहे हैं, जिससे समुद्र के पानी का तापमान बढ़ रहा है। गर्म पानी और तीव्र होती समुद्री धाराएं ग्लेशियरों को तेजी से निगल रही हैं।
भविष्य की चुनौतियां और वैज्ञानिकों की चेतावनी
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस रिपोर्ट के निष्कर्ष आने वाले दिनों में समुद्र के जलस्तर में होने वाली वृद्धि के सटीक पूर्वानुमान में काफी मददगार साबित होंगे। फिलहाल इस प्रक्रिया के रुकने या उलटने के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं। यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन पर तत्काल वैश्विक नियंत्रण नहीं लगाया गया, तो जलस्तर में इस लगातार वृद्धि के कारण आने वाले समय में दुनिया भर के निचले और तटीय इलाकों का अस्तित्व संकट में पड़ सकता है।