पश्चिम एशिया में अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान के खिलाफ शुरू हुई कार्रवाई ने पूरे क्षेत्र को युद्ध की दहलीज पर खड़ा कर दिया है। सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत के बाद हालात और तनावपूर्ण हो गए हैं। इस बीच चीन और ईरान के बीच दशकों से चले आ रहे ऊर्जा संबंध फिर चर्चा में हैं, क्योंकि यह तनाव सीधे-सीधे चीन की आर्थिक सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। ईरान के खिलाफ हमलों के बाद जिन तेल मार्गों पर खतरा मंडरा रहा है, वे चीन की अर्थव्यवस्था की धड़कन जैसे हैं।
चीन की ऊर्जा सुरक्षा पर गहराया संकट
चीन के लिए यह संघर्ष मात्र भू-राजनीतिक घटना नहीं बल्कि सीधे आर्थिक जोखिम से जुड़ा मामला है। ईरान अपने कुल तेल निर्यात का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा चीन को बेचता है। 2025 में चीन ने लगभग 13.8 लाख बैरल प्रति दिन ईरान से तेल खरीदा, जो उसके समुद्री आयात का 13 से 14 प्रतिशत हिस्सा है। हालांकि रूस और सऊदी अरब उसके सबसे बड़े सप्लायर हैं, लेकिन ईरानी तेल उसकी ऊर्जा जरूरतों का स्थिर और सस्ता विकल्प रहा है। हालिया तनाव के बाद चीन की रिफाइनरियों ने चुपचाप ईरानी तेल की खरीद घटाकर रूसी तेल पर निर्भरता बढ़ा दी है ताकि सप्लाई में रुकावट न आए।
रणनीतिक गलती और ईरान की चुनौती
एवेलॉन इंटेलिजेंस के सह-संस्थापक बालकृष्णन का मानना है कि ईरान की जवाबी कार्रवाई उसके लिए रणनीतिक रूप से भारी पड़ सकती है। उनके अनुसार, ईरान न केवल एक मजबूत सैन्य गठबंधन से जूझ रहा है, बल्कि वह चीन की ऊर्जा रणनीति में अपनी अहम भूमिका को भी खतरे में डाल रहा है। दोनों देशों के बीच 25 साल का महत्वपूर्ण सहयोग समझौता है, जिसमें ऊर्जा, अधोसंरचना और बेल्ट एंड रोड परियोजनाएं शामिल हैं। पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच सस्ता तेल चीन के लिए एक वरदान जैसा रहा है, लेकिन अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाकर ईरान ने कई तटस्थ देशों को भी अपने खिलाफ खड़ा करने का जोखिम उठाया है।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य: चीन का सबसे बड़ा डर
चीन के लिए सबसे संवेदनशील बिंदु हॉर्मुज जलडमरूमध्य है, जिससे उसके लगभग 44 प्रतिशत तेल आयात गुजरते हैं। अगर यह मार्ग अवरुद्ध हुआ या यहां किसी बड़ी बाधा का सामना करना पड़ा, तो इसका प्रभाव चीन की अर्थव्यवस्था पर गंभीर पड़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस स्थिति में तेल की कीमतें 100 से 130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं, जिससे उद्योगों पर भारी दबाव पड़ेगा और आर्थिक विकास की गति प्रभावित होगी। यही वजह है कि चीन के लिए यह संघर्ष अपने संसाधनों और सप्लाई चेन की सुरक्षा का सीधा प्रश्न बन चुका है।
चीन और ईरान संबंधों की असमानता और ड्रैगन की रणनीति
चीन और ईरान के रिश्तों में एक असमानता हमेशा से रही है। ईरान को चीन की जरूरत अधिक है, जबकि चीन के पास रूस और खाड़ी देशों जैसे कई विकल्प मौजूद हैं। चीन न केवल ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है, बल्कि उसके पास कूटनीतिक दबाव बनाने की क्षमता भी है। अगर ईरान इस संघर्ष में ज्यादा कमजोर पड़ता है, तो वह चीन के निवेश, तकनीक और राजनीतिक समर्थन पर और निर्भर हो जाएगा। लेकिन यह स्थिति तभी तक चीन के लिए फायदेमंद है, जब तक यह संघर्ष पूरे क्षेत्र में बड़े संकट का रूप नहीं ले लेता।
चीन की सतर्क निगरानी और सीमित प्रतिक्रिया
फिलहाल चीन युद्ध की औपचारिक आलोचना कर रहा है और स्थितियों पर पैनी नजर बनाए हुए है। वह ईरान, रूस और खाड़ी देशों के बीच अपने तेल आयात को सावधानीपूर्वक संतुलित कर रहा है ताकि किसी भी संभावित संकट का प्रभाव उसकी अर्थव्यवस्था पर नियंत्रित रहे। उसकी चुप्पी असल में एक गहरी रणनीतिक योजना का हिस्सा है, जिसमें जोखिम कम करना और संसाधनों की सुरक्षा बनाए रखना मुख्य लक्ष्य है।
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