भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले कृषि क्षेत्र के सामने आगामी वर्ष में बड़ी चुनौती खड़ी होती दिखाई दे रही है। अल नीनो की संभावित मजबूत स्थिति और सामान्य से कम वर्षा के अनुमान ने कृषि विशेषज्ञों तथा अर्थशास्त्रियों की चिंताओं को बढ़ा दिया है। जानकारों का मानना है कि यदि मानसून अपेक्षित स्तर से कमजोर रहता है तो कृषि उत्पादन पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। इसका सीधा असर किसानों की आय, ग्रामीण मांग और देश की समग्र आर्थिक गतिविधियों पर देखने को मिलेगा। यही कारण है कि आगामी वित्त वर्ष 2026-27 को कृषि क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा के रूप में देखा जा रहा है।
अल नीनो बना सबसे बड़ा जोखिम
मौसम वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों के अनुसार इस वर्ष अल नीनो का प्रभाव सामान्य से अधिक मजबूत हो सकता है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग द्वारा सामान्य औसत वर्षा से कम बारिश की संभावना जताए जाने के बाद कृषि क्षेत्र में चिंता बढ़ गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि वर्षा का वितरण और समय दोनों कृषि उत्पादन को प्रभावित करते हैं। यदि मानसून के महत्वपूर्ण महीनों में पर्याप्त वर्षा नहीं होती है तो खरीफ फसलों की बुआई और विकास दोनों प्रभावित हो सकते हैं। यही कारण है कि कृषि विकास दर के शून्य अथवा नकारात्मक रहने की आशंका व्यक्त की जा रही है।
किसान बदल रहे हैं अपनी फसल रणनीति
अनिश्चित मौसम और जल संकट की आशंकाओं को देखते हुए किसान पहले से ही अपनी खेती की रणनीति में बदलाव करने लगे हैं। कई क्षेत्रों में किसान अधिक पानी और अधिक निवेश वाली फसलों के बजाय कम पानी की आवश्यकता वाली फसलों को प्राथमिकता दे रहे हैं। बाजरा, ज्वार और मूंग जैसी फसलों की ओर झुकाव बढ़ रहा है क्योंकि ये सीमित वर्षा की परिस्थितियों में भी अपेक्षाकृत बेहतर उत्पादन दे सकती हैं। हालांकि इन फसलों से होने वाली आय कई बार पारंपरिक नकदी फसलों की तुलना में कम होती है, जिससे किसानों की कुल कमाई प्रभावित हो सकती है।
सूखे जैसे हालात का खतरा बढ़ा
कृषि अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि मानसून में व्यापक कमी दर्ज होती है तो देश के कई हिस्सों में सूखे जैसी परिस्थितियां बन सकती हैं। ऐसी स्थिति में न केवल फसल उत्पादन घटेगा बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी गंभीर दबाव पड़ेगा। भारत की बड़ी आबादी आज भी कृषि और उससे जुड़े व्यवसायों पर निर्भर है। उत्पादन में कमी आने से किसानों की आय प्रभावित होगी, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोग क्षमता घट सकती है। यह स्थिति समग्र आर्थिक विकास की गति को भी प्रभावित कर सकती है क्योंकि ग्रामीण मांग देश की उपभोक्ता अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार मानी जाती है।
प्रमुख खरीफ फसलों पर पड़ सकता है असर
विशेषज्ञों के अनुसार सोयाबीन, अरहर, उड़द और कपास जैसी महत्वपूर्ण खरीफ फसलें वर्षा पर काफी हद तक निर्भर रहती हैं। यदि मानसून कमजोर रहता है या लंबे समय तक वर्षा में अंतराल बना रहता है तो इन फसलों में नमी की कमी गंभीर समस्या बन सकती है। नमी तनाव की स्थिति में फसलों की वृद्धि प्रभावित होती है और उत्पादकता में गिरावट आ सकती है। इससे किसानों की आय कम होने के साथ-साथ कृषि क्षेत्र के कुल उत्पादन पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका है।
बढ़ती लागत ने और बढ़ाई मुश्किलें
कृषि क्षेत्र की चुनौतियां केवल मौसम तक सीमित नहीं हैं। खेती में इस्तेमाल होने वाले उर्वरक, कीटनाशक, डीजल और अन्य कृषि संसाधनों की बढ़ती कीमतें भी किसानों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाल रही हैं। कई क्षेत्रों से खाद की कमी और ऊंची कीमतों पर उपलब्धता की शिकायतें सामने आई हैं। इसके अलावा ऊर्जा लागत बढ़ने से ट्रैक्टर, कृषि मशीनरी और सिंचाई पंपों के संचालन का खर्च भी बढ़ गया है। ऐसे में यदि उत्पादन प्रभावित होता है तो किसानों की लाभप्रदता पर दोहरा दबाव पड़ सकता है।
खाद्य महंगाई बढ़ने की आशंका
कृषि उत्पादन में संभावित गिरावट का असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहेगा। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि दालें, तिलहन, मोटे अनाज, कपास और सब्जियों जैसी फसलों की उपलब्धता प्रभावित होने पर इनके दाम बढ़ सकते हैं। इससे खाद्य महंगाई में वृद्धि की आशंका है। यदि खाद्य वस्तुओं की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी होती है तो उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई भी ऊंचे स्तर पर पहुंच सकती है। महंगाई बढ़ने से आम उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति प्रभावित होगी और आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ सकता है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है व्यापक प्रभाव
ग्रामीण भारत देश की आर्थिक संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कृषि आय में गिरावट का प्रभाव उपभोक्ता वस्तुओं, कृषि उपकरणों, वाहन बिक्री और अन्य ग्रामीण बाजारों पर भी दिखाई दे सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसानों की आय घटती है तो ग्रामीण क्षेत्रों में मांग कमजोर पड़ सकती है। इससे विभिन्न उद्योगों की बिक्री प्रभावित होगी और आर्थिक गतिविधियों की गति धीमी हो सकती है। इसलिए कृषि क्षेत्र की स्थिति केवल किसानों तक सीमित मुद्दा नहीं बल्कि संपूर्ण अर्थव्यवस्था से जुड़ा विषय बन जाती है।
मानसून पर टिकी हैं देश की उम्मीदें
वर्तमान परिस्थितियों में देश की निगाहें मानसून की प्रगति पर टिकी हुई हैं। यदि वर्षा का वितरण अपेक्षा से बेहतर रहता है तो कई आशंकाओं को कम किया जा सकता है। वहीं यदि अल नीनो का प्रभाव मजबूत होता है और वर्षा में उल्लेखनीय कमी आती है, तो कृषि क्षेत्र को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। आने वाले कुछ महीने यह तय करेंगे कि भारत का कृषि क्षेत्र इस संभावित संकट से कितनी प्रभावी ढंग से निपट पाता है और देश की अर्थव्यवस्था पर इसका कितना असर पड़ता है।