प्रशांत महासागर में विकसित हो रही अलनीनो प्रणाली को लेकर वैज्ञानिक समुदाय लगातार सतर्क कर रहा है। अमेरिकी जलवायु पूर्वानुमान केंद्र के अनुसार यह पिछले लगभग 75 वर्षों के सबसे प्रभावशाली अलनीनो प्रकरणों में से एक हो सकता है। पूर्वानुमानों के मुताबिक इसके वर्ष के अंत तक और अधिक मजबूत होने की संभावना है तथा इसके 2027 के शुरुआती वसंत तक बने रहने की आशंका व्यक्त की गई है। यदि ऐसा होता है तो इसका असर केवल मौसम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि खाद्य सुरक्षा, जल संसाधनों, ऊर्जा उत्पादन, औद्योगिक गतिविधियों और वैश्विक अर्थव्यवस्था तक व्यापक रूप से महसूस किया जाएगा। विशेषज्ञ इसे जलवायु परिवर्तन के दौर में एक गंभीर चेतावनी के रूप में देख रहे हैं।
भारत के ऊर्जा क्षेत्र पर बढ़ा दबाव, जलविद्युत उत्पादन में गिरावट
अलनीनो का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव भारत के ऊर्जा क्षेत्र में दिखाई देने लगा है। कम वर्षा और जलाशयों में घटते जलस्तर के कारण जलविद्युत परियोजनाओं का उत्पादन प्रभावित हुआ है। विद्युत मंत्रालय के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार जलविद्युत उत्पादन में पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 21 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है, जो हाल के वर्षों की सबसे बड़ी कमी मानी जा रही है। जून में समाप्त तिमाही के दौरान बांधों से बिजली उत्पादन में भी उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई। इसके चलते बढ़ती बिजली मांग को पूरा करने के लिए कोयला आधारित, परमाणु तथा अन्य नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्रों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वर्षा सामान्य से कम रहती है तो आने वाले महीनों में ऊर्जा आपूर्ति और बिजली प्रबंधन सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
खरीफ खेती पर गहराया संकट, बुवाई का रकबा सिमटा
अलनीनो का असर कृषि क्षेत्र में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। मानसून की अनिश्चितता के कारण देश के अनेक हिस्सों में खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हुई है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार जुलाई के प्रारंभ तक खेती का कुल रकबा पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 20.8 प्रतिशत कम रहा। विशेष रूप से धान जैसी वर्षा आधारित प्रमुख फसल के क्षेत्रफल में कमी दर्ज की गई है। इसके साथ ही गन्ना, अरहर, मूंगफली तथा अन्य दलहन और तिलहन फसलों की बुवाई भी प्रभावित हुई है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मानसून की स्थिति में शीघ्र सुधार नहीं हुआ तो उत्पादन लक्ष्य प्रभावित हो सकते हैं, जिसका असर खाद्यान्न उपलब्धता और कृषि आय दोनों पर पड़ सकता है।
दुनिया भर में चरम मौसम की घटनाओं का बढ़ सकता है खतरा
जलवायु वैज्ञानिकों के अनुसार शक्तिशाली अलनीनो का प्रभाव केवल दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं रहेगा। इसके कारण विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में मौसम की चरम घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ सकती है। कई देशों में सूखा, अत्यधिक वर्षा, विनाशकारी बाढ़, शक्तिशाली चक्रवात, असामान्य ठंड तथा भीषण गर्मी जैसी परिस्थितियां उत्पन्न होने की आशंका जताई जा रही है। ऑस्ट्रेलिया में लंबे सूखे और जंगलों में आग लगने का जोखिम बढ़ने का अनुमान है, जबकि अन्य क्षेत्रों में कृषि उत्पादन और जल संसाधनों पर गंभीर दबाव पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मौसमीय बदलाव वैश्विक खाद्य आपूर्ति श्रृंखला और ऊर्जा बाजारों को भी प्रभावित कर सकते हैं।
दीर्घकालिक रणनीति ही बन सकती है सबसे बड़ा समाधान
विशेषज्ञों का मानना है कि अलनीनो जैसी प्राकृतिक जलवायु घटनाओं का प्रभाव पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन उनके दुष्प्रभावों को प्रभावी नीति और समयबद्ध तैयारी के माध्यम से काफी हद तक कम किया जा सकता है। जल संरक्षण, सिंचाई अवसंरचना का विस्तार, जलाशयों का वैज्ञानिक प्रबंधन, जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों को बढ़ावा तथा ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण समय की आवश्यकता बन चुके हैं। साथ ही मौसम पूर्वानुमान प्रणाली को अधिक सटीक बनाकर किसानों, बिजली क्षेत्र और आपदा प्रबंधन एजेंसियों तक समय पर सूचना पहुंचाना भी अत्यंत आवश्यक है। बदलती जलवायु परिस्थितियों में दीर्घकालिक योजना और वैज्ञानिक दृष्टिकोण ही भारत को भविष्य की ऐसी चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने में सक्षम बना सकते हैं।