नई दिल्ली - भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI) के वैज्ञानिकों ने दक्षिण-पूर्वी अरब सागर की गहराइयों में बिजली पैदा करने वाली मछली की एक नई प्रजाति की पहचान की है। इस प्रजाति का नाम ‘टेट्रोनार्स रमणमूर्ति’ (Tetronarce ramachandramurthyi नहीं, बल्कि प्रकाशित वैज्ञानिक नाम की पुष्टि आवश्यक) रखा गया है। इसे पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के गहरे महासागर मिशन के मिशन निदेशक डॉ. एमवी रमणमूर्ति के सम्मान में नाम दिए जाने की बात कही गई है। यह खोज उत्तरी हिंद महासागर में इस समूह की मौजूदगी के नए प्रमाण के रूप में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
नौ नमूनों के अध्ययन से हुई नई प्रजाति की पहचान
इस खोज का नेतृत्व चेन्नई स्थित भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के समुद्री जीव विज्ञान क्षेत्रीय केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. केके बिनीश और कनिष्ठ शोधार्थी अनिल काशीनाथ ने किया। अमेरिका की सैन जोस स्टेट यूनिवर्सिटी से संबद्ध मोस लैंडिंग मरीन लैबोरेटरीज के पैसिफिक शार्क रिसर्च सेंटर के डॉ. डेविड ए. एबर्ट ने भी शोध में सहयोग दिया।
वैज्ञानिकों ने भारत के दक्षिण-पश्चिमी तट के पास से एकत्र किए गए नौ नमूनों के शारीरिक लक्षणों और आनुवंशिक संरचना का अध्ययन किया। इसके आधार पर मछली की अलग प्रजाति होने की पहचान की गई।
‘अरेबियन ब्लैक इलेक्ट्रिक रे’ है सामान्य नाम
इस नई प्रजाति को सामान्य तौर पर ‘अरेबियन ब्लैक इलेक्ट्रिक रे’ कहा गया है। इसका शरीर गहरे नीले-काले से लेकर गहरे भूरे रंग का होता है। शरीर की बनावट, आंखों के पीछे स्थित श्वसन छिद्रों के आसपास पैपिला की अनुपस्थिति और छोटे विद्युत अंग इसे संबंधित प्रजातियों से अलग पहचान देते हैं। इलेक्ट्रिक रे समूह की मछलियों में विशेष विद्युत अंग होते हैं, जिनकी मदद से वे बिजली के झटके पैदा कर सकती हैं। इनका इस्तेमाल शिकार को निष्क्रिय करने और आत्मरक्षा में किया जा सकता है।
आनुवंशिक जांच से मिली अलग विकासवादी पहचान
वैज्ञानिकों ने इस प्रजाति की पहचान की पुष्टि के लिए माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए के दो जीन—COI और ND2—का विश्लेषण किया। अध्ययन में संबंधित प्रजातियों के मुकाबले आनुवंशिक अंतर 2.2 से 6.7 प्रतिशत तक पाया गया। इसके अलावा, इस मछली में कुल 99 कशेरुकाएं दर्ज की गईं। शारीरिक विशेषताओं और आनुवंशिक विश्लेषण के संयुक्त नतीजों ने इसकी अलग पहचान स्थापित करने में मदद की।
गहरे समुद्र की जैव विविधता समझने में मिलेगी मदद
उत्तरी हिंद महासागर में टेट्रोनार्स समूह की मौजूदगी का यह पहला प्रमाणित अभिलेख बताया गया है। यह खोज भारत के गहरे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में मौजूद जीवों की विविधता और उनके विकासक्रम को समझने के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। समुद्र की गहराइयों में अब भी कई ऐसे जीव मौजूद हैं, जिनके बारे में वैज्ञानिक जानकारी सीमित है। इस तरह की खोजें समुद्री जैव विविधता का दस्तावेजीकरण करने और पारिस्थितिकी तंत्र के अध्ययन को आगे बढ़ाने में योगदान देती हैं।
महत्वपूर्ण तथ्य-जांच: खबर में नई प्रजाति के वैज्ञानिक नाम की वर्तनी की पुष्टि जरूरी है। नामकरण और शोध के निष्कर्ष प्रकाशित करने से पहले ZSI की आधिकारिक विज्ञप्ति या संबंधित वैज्ञानिक शोधपत्र से नाम, खोज-स्थल और ‘पहली प्रमाणित मौजूदगी’ के दावे का मिलान कर लें।