विश्व स्तनपान सप्ताह प्रत्येक वर्ष 1 से 7 अगस्त तक मनाया जाता है। इसका उद्देश्य केवल माताओं को स्तनपान के लिए प्रेरित करना नहीं, बल्कि समाज, परिवार, स्वास्थ्य व्यवस्था और नीति-निर्माताओं को यह याद दिलाना भी है कि शिशु के जीवन की सबसे सुरक्षित और प्राकृतिक शुरुआत मां के दूध से होती है। भारत जैसे देश में, जहां हर वर्ष करोड़ों बच्चों का जन्म होता है, स्तनपान केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य का विषय नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, पोषण, आर्थिक विकास और भविष्य की मानव पूंजी से जुड़ा राष्ट्रीय मुद्दा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और यूनिसेफ (UNICEF) की सिफारिश है कि जन्म के पहले घंटे के भीतर स्तनपान शुरू किया जाए, जीवन के पहले छह महीनों तक केवल मां का दूध दिया जाए तथा इसके बाद दो वर्ष या उससे अधिक समय तक पूरक आहार के साथ स्तनपान जारी रखा जाए। भारत ने इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन हाल के वर्षों में शहरी क्षेत्रों और कामकाजी महिलाओं के बीच कई नई चुनौतियां सामने आई हैं, जिनसे स्तनपान के आंकड़ों पर असर पड़ रहा है।
भारत में बदलती तस्वीर और चिंता के संकेत
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के अनुसार भारत में केवल स्तनपान कराने की स्थिति पहले की तुलना में बेहतर हुई है, लेकिन यह सुधार सभी राज्यों और सभी सामाजिक वर्गों में समान नहीं है। महानगरों, उच्च आय वर्ग और निजी अस्पतालों में जन्म लेने वाले कई बच्चों को जन्म के तुरंत बाद स्तनपान शुरू नहीं हो पाता। दूसरी ओर, कई ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता और स्वास्थ्य सेवाओं की सीमाओं के कारण भी शुरुआती स्तनपान प्रभावित होता है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि आज सबसे बड़ी चुनौती केवल स्तनपान के प्रति जानकारी की कमी नहीं है, बल्कि आधुनिक जीवनशैली का दबाव है। नौकरी पर जल्दी लौटना, संयुक्त परिवारों का टूटना, प्रसव के बाद पर्याप्त सहयोग का अभाव और सोशल मीडिया पर कृत्रिम शिशु आहार से जुड़े भ्रम माताओं के निर्णय को प्रभावित कर रहे हैं। यही कारण है कि अनेक महिलाएं चाहकर भी लंबे समय तक स्तनपान जारी नहीं रख पातीं।
कामकाजी महिलाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती
भारत में महिलाओं की कार्यभागीदारी धीरे-धीरे बढ़ रही है, लेकिन अधिकांश कार्यस्थलों पर स्तनपान के अनुकूल सुविधाएं अभी भी पर्याप्त नहीं हैं। मातृत्व अवकाश समाप्त होने के बाद अनेक महिलाओं को शिशु से दूर रहना पड़ता है। कई संस्थानों में दूध निकालकर सुरक्षित रखने की व्यवस्था, स्तनपान कक्ष या लचीले कार्य समय जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि मातृत्व लाभ अधिनियम के बावजूद असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली लाखों महिलाओं तक इन सुविधाओं का लाभ नहीं पहुंच पाता। घरेलू कामगारों, खेतिहर मजदूरों, फैक्ट्री कर्मचारियों और छोटे निजी प्रतिष्ठानों में कार्यरत महिलाओं के लिए स्तनपान जारी रखना कहीं अधिक कठिन हो जाता है। यदि कार्यस्थलों को मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के अनुकूल बनाया जाए तो स्तनपान की दर में उल्लेखनीय सुधार संभव है।
भ्रम, विपणन और सामाजिक धारणाएं भी बन रहीं बाधा
चिकित्सकों का कहना है कि कई परिवारों में आज भी यह गलत धारणा बनी हुई है कि मां का दूध पर्याप्त नहीं होता या आधुनिक शिशु आहार उससे अधिक पौष्टिक है। हालांकि वैज्ञानिक शोध स्पष्ट रूप से बताते हैं कि जीवन के पहले छह महीनों तक मां का दूध ही शिशु के लिए संपूर्ण पोषण प्रदान करता है और सामान्य परिस्थितियों में किसी अतिरिक्त भोजन या पानी की आवश्यकता नहीं होती।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि शिशु आहार उत्पादों के आक्रामक विपणन, इंटरनेट पर उपलब्ध अधूरी जानकारी और सामाजिक दबाव के कारण नई माताएं कई बार भ्रमित हो जाती हैं। प्रसव के बाद सही परामर्श और परिवार का सहयोग न मिलने पर वे समय से पहले स्तनपान छोड़ देती हैं। इसलिए स्वास्थ्य विशेषज्ञ केवल माताओं ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार को इस विषय में शिक्षित करने पर जोर देते हैं।
मां और शिशु दोनों के लिए जीवनभर का निवेश
मां का दूध केवल पोषण का स्रोत नहीं, बल्कि प्राकृतिक प्रतिरक्षा कवच भी है। इससे शिशु में दस्त, निमोनिया, कुपोषण और अनेक संक्रामक रोगों का खतरा कम होता है। शोध बताते हैं कि लंबे समय तक स्तनपान कराने वाले बच्चों में मोटापा, मधुमेह और कुछ अन्य गैर-संचारी रोगों का जोखिम भी अपेक्षाकृत कम हो सकता है। साथ ही, मां और शिशु के बीच भावनात्मक जुड़ाव मजबूत होता है, जो मानसिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
माताओं के लिए भी स्तनपान अनेक स्वास्थ्य लाभ लेकर आता है। इससे प्रसव के बाद शरीर को सामान्य स्थिति में लौटने में मदद मिलती है तथा स्तन और डिम्बग्रंथि के कुछ प्रकार के कैंसर का जोखिम कम होने से भी इसका संबंध पाया गया है। इसके अतिरिक्त, स्तनपान परिवार पर आर्थिक बोझ कम करता है क्योंकि कृत्रिम शिशु आहार पर होने वाला खर्च बच जाता है।
सरकार, स्वास्थ्य व्यवस्था और समाज की साझा जिम्मेदारी
भारत सरकार ने मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य को मजबूत करने के लिए कई योजनाएं और कार्यक्रम शुरू किए हैं। अस्पतालों में जन्म के पहले घंटे में स्तनपान शुरू कराने, आशा कार्यकर्ताओं एवं आंगनवाड़ी नेटवर्क के माध्यम से जागरूकता बढ़ाने तथा पोषण अभियान जैसे प्रयासों ने सकारात्मक प्रभाव डाला है। फिर भी विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल सरकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी, जब तक समाज और निजी क्षेत्र भी समान रूप से जिम्मेदारी नहीं निभाते।
चिकित्सकों का सुझाव है कि प्रत्येक अस्पताल में स्तनपान परामर्शदाता उपलब्ध हों, कार्यस्थलों पर मातृ-अनुकूल सुविधाएं विकसित की जाएं, प्रसव के बाद परिवारों को वैज्ञानिक जानकारी दी जाए और कृत्रिम शिशु आहार के अनावश्यक प्रचार पर प्रभावी निगरानी रखी जाए। साथ ही, पिता और परिवार के अन्य सदस्यों की सक्रिय भागीदारी भी स्तनपान को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
विश्व स्तनपान सप्ताह 2026 का संदेश: हर बच्चे का पहला अधिकार
विश्व स्तनपान सप्ताह केवल एक स्वास्थ्य अभियान नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के बेहतर भविष्य का संकल्प है। भारत यदि कुपोषण कम करना, बाल मृत्यु दर घटाना और स्वस्थ मानव संसाधन तैयार करना चाहता है, तो स्तनपान को राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में और अधिक मजबूती से अपनाना होगा।
स्तनपान केवल मां की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि परिवार, समाज, स्वास्थ्य व्यवस्था, नियोक्ताओं और सरकार की साझा जिम्मेदारी है। जब प्रत्येक नवजात को जीवन की शुरुआत मां के दूध से मिलेगी और प्रत्येक मां को स्तनपान कराने के लिए सम्मान, सहयोग तथा अनुकूल वातावरण मिलेगा, तभी स्वस्थ भारत का सपना वास्तविक अर्थों में साकार हो सकेगा।