नई दिल्ली - विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 2026 के सफल आयोजन को भारत की वैश्विक कूटनीतिक क्षमता का महत्वपूर्ण उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि सम्मेलन में बड़ी संख्या में देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की भागीदारी रही और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने वैश्विक मंच पर अपनी मजबूत भूमिका दर्ज कराई। जयशंकर के मुताबिक, सम्मेलन में कुल 32 प्रतिनिधिमंडलों ने हिस्सा लिया। इनमें 11 सदस्य देशों, 10 साझेदार देशों, 4 क्षेत्रीय संगठनों और 7 अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधि शामिल थे।
कई देशों के शीर्ष नेता सम्मेलन में पहुंचे
विदेश मंत्री ने कहा कि ब्रिक्स सम्मेलन की खास बात यह रही कि अधिकांश देशों ने राष्ट्राध्यक्ष या सरकार प्रमुख के स्तर पर प्रतिनिधित्व किया। सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो, दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन समेत कई शीर्ष नेता शामिल हुए। इसके अलावा इथियोपिया के प्रधानमंत्री अबी अहमद, यूएई के क्राउन प्रिंस और मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी सहित अन्य प्रमुख नेताओं की भागीदारी भी रही। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के अलावा विश्व व्यापार संगठन, विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के प्रमुखों ने भी सम्मेलन में हिस्सा लिया।
वैश्विक तनाव के बीच बनी सहमति
जयशंकर ने कहा कि सम्मेलन ऐसे समय हुआ जब दुनिया कई राजनीतिक और भू-राजनीतिक चुनौतियों से गुजर रही है। इसके बावजूद ब्रिक्स देशों ने कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर साझा सहमति बनाने की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास किया। पश्चिम एशिया और मध्य पूर्व के संघर्षों को लेकर शांति, सुरक्षा और स्थिरता की जरूरत पर जोर दिया गया। साथ ही वैश्विक व्यापार, आपूर्ति शृंखला और ऊर्जा आपूर्ति को सुचारू बनाए रखने तथा आम नागरिकों और नागरिक बुनियादी ढांचे की सुरक्षा को लेकर भी चर्चा हुई।
बातचीत के लिए महत्वपूर्ण मंच बना BRICS
विदेश मंत्री ने कहा कि सम्मेलन सिर्फ मतभेदों को कम करने तक सीमित नहीं रहा। इसने अलग-अलग देशों के नेताओं को सीधे बातचीत का अवसर भी दिया। जयशंकर के मुताबिक, कई ऐसे नेता भी इस मंच पर एक साथ आए, जिनके लिए सामान्य परिस्थितियों में आपस में मुलाकात करना आसान नहीं होता। इस तरह ब्रिक्स ने वैश्विक चुनौतियों पर संवाद और कूटनीतिक बातचीत के लिए एक महत्वपूर्ण मंच की भूमिका निभाई।
ग्लोबल साउथ की आवाज पर जोर
जयशंकर ने कहा कि शिखर सम्मेलन में वैश्विक अर्थव्यवस्था, विकास, तकनीक और ग्लोबल साउथ से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता दी गई। सम्मेलन के जरिए यह संदेश देने की कोशिश हुई कि विकासशील देशों की जरूरतों और चिंताओं को वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में अधिक महत्व मिलना चाहिए। उन्होंने बताया कि सम्मेलन के प्रमुख विषयों में ‘सुधार’ और ‘लचीलापन’ शामिल रहे। इन मुद्दों ने सदस्य देशों को साझा प्राथमिकताओं पर चर्चा करने का आधार दिया।
आतंकवाद के खिलाफ साझा रुख
विदेश मंत्री ने आतंकवाद के मुद्दे पर भी ब्रिक्स देशों के बीच सहमति का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि सदस्य देशों ने आतंकवाद के सभी रूपों की निंदा करने और इसके खिलाफ प्रभावी कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया। जयशंकर ने 22 अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसे हमले अस्वीकार्य हैं। उन्होंने सीमा पार आतंकवाद समेत आतंकवाद के सभी रूपों के खिलाफ शून्य सहिष्णुता और दोहरे मानदंडों को खारिज करने की जरूरत बताई।
‘संवाद, कूटनीति और विकास’ का संदेश
जयशंकर ने कहा कि ब्रिक्स सम्मेलन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘संवाद, कूटनीति और विकास’ के दृष्टिकोण को दर्शाता है। उनके अनुसार, दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से शीर्ष नेताओं की सक्रिय भागीदारी भारत की कूटनीतिक पहुंच और भूमिका को दर्शाती है। विदेश मंत्री ने कहा कि सम्मेलन से पहले कुछ लोगों को इसकी सफलता को लेकर आशंकाएं थीं, लेकिन नई दिल्ली में इसका सफल आयोजन हुआ। उनके मुताबिक, ब्रिक्स 2026 ने एक बार फिर यह दिखाया कि भारत वैश्विक मुद्दों पर संवाद को आगे बढ़ाने और विभिन्न देशों को एक मंच पर लाने की क्षमता रखता है।