नई दिल्ली - समान नागरिक संहिता यानी UCC को लेकर सियासी बहस एक बार फिर तेज हो गई है। एआईएमआईएम प्रमुख और सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की UCC से जुड़ी घोषणा पर सवाल उठाते हुए केंद्र सरकार और भाजपा पर तीखा हमला बोला है। ओवैसी ने आरोप लगाया कि समान नागरिक संहिता के नाम पर देश के गैर-हिंदू समुदायों पर हिंदू कानून लागू करने की कोशिश की जा सकती है।
‘UCC समानता नहीं, मुसलमानों को निशाना बनाने की कोशिश’
ओवैसी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी प्रतिक्रिया साझा करते हुए कहा कि भाजपा द्वारा नियुक्त विधि आयोग पहले यह कह चुका है कि UCC न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय। उन्होंने भारत की विविधता को देश की पहचान बताते हुए दावा किया कि UCC का वास्तविक उद्देश्य गैर-हिंदू समुदायों पर हिंदू कानून थोपना होगा।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि भाजपा शासित कुछ राज्यों में ऐसे कानून बनाए गए हैं, जिनका असर अलग-अलग समुदायों के बीच संपत्ति संबंधी लेनदेन पर पड़ता है। ओवैसी ने इसे UCC की मांग के साथ विरोधाभासी बताया।
‘लव जिहाद’ कानूनों को लेकर भी सवाल
AIMIM प्रमुख ने तथाकथित ‘लव जिहाद’ कानूनों का भी मुद्दा उठाया। उनका आरोप है कि इन कानूनों का इस्तेमाल मुख्य रूप से मुस्लिम और ईसाई समुदायों को निशाना बनाने के लिए किया गया है। ओवैसी ने दावा किया कि UCC का मुद्दा समानता स्थापित करने के बजाय मुसलमानों को निशाना बनाने की राजनीति से जुड़ा हुआ है। हालांकि, ये ओवैसी के राजनीतिक आरोप हैं और केंद्र सरकार या भाजपा का इस पर अलग पक्ष हो सकता है।
भाजपा सहयोगियों को दी राजनीतिक नसीहत
ओवैसी ने भाजपा के सहयोगी दलों को भी निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि अब सहयोगी पार्टियों के लिए यह दिखाने का समय है कि उनकी अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान और आवाज है। उनके मुताबिक, सहयोगी दलों को केवल ‘छोटी भाजपा’ की भूमिका तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
CAA-NRC आंदोलन का भी किया जिक्र
ओवैसी ने अपने बयान में CAA-NRC विरोधी आंदोलन का भी उल्लेख किया। उन्होंने आरोप लगाया कि अमित शाह की ‘क्रोनोलॉजी’ वाली राजनीति के कारण वर्ष 2019 में देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए थे। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस समय दिए गए बयानों का भी हवाला दिया, जिनमें NRC को लेकर स्पष्टीकरण दिया गया था।
SIR और NRC को लेकर जताई चिंता
ओवैसी ने मौजूदा SIR प्रक्रिया का जिक्र करते हुए दावा किया कि आम लोगों को दस्तावेजों के साथ सुनवाई में शामिल होना पड़ रहा है, जिससे विशेष रूप से अल्पसंख्यक, SC-ST और प्रवासी समुदायों को परेशानी हो रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर भविष्य में NRC जैसी व्यापक प्रक्रिया लागू होती है तो लोगों पर अपनी नागरिकता साबित करने का दबाव और बढ़ सकता है। ओवैसी ने सवाल उठाया कि जिन करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी सरकारी योजनाओं और राशन पर निर्भर है, उनसे पुराने दस्तावेज जुटाकर नागरिकता साबित करने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है।
ओवैसी ने असम में NRC के अनुभव का हवाला देते हुए इसे चिंताजनक बताया और कहा कि नागरिकता से जुड़े मामलों में आम लोगों को सरकारी अधिकारियों के सामने दस्तावेजों के लिए निर्भर होना पड़ सकता है।