विदिशा - मध्य प्रदेश के विदिशा जिले से इतिहास और पुरातत्व प्रेमियों के लिए एक अहम खबर सामने आई है। यहां पहाड़ी पर स्थित करीब 1,100 साल पुराने ऐतिहासिक रॉक-कट जैन मंदिर को संरक्षित करने के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने विशेष योजना तैयार की है। मंदिर की संरचनात्मक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इसे पहले सावधानीपूर्वक खोला जाएगा। इस प्रक्रिया में मंदिर के प्रत्येक पत्थर पर अलग-अलग निशान लगाए जाएंगे और उसकी नक्काशी सहित सभी स्थापत्य विशेषताओं का विस्तृत दस्तावेजीकरण किया जाएगा, ताकि बाद में मूल स्वरूप को सुरक्षित रखते हुए इसे फिर से स्थापित किया जा सके।
850 से 885 ईस्वी के बीच हुई थी स्थापना
इस प्राचीन मंदिर का इतिहास करीब 1,100 साल पुराना बताया जाता है। ब्रिटिश म्यूजियम में संरक्षित एक कलचुरी शिलालेख के अनुसार, इसका निर्माण 850 से 885 ईस्वी के बीच ग्यारसपुर क्षेत्र के कलचुरी शासक वल्लेक के शासनकाल में हुआ था। यह मंदिर उस दौर की धार्मिक आस्था और स्थापत्य कला का महत्वपूर्ण प्रमाण माना जाता है।
प्रतिहार वास्तुकला की शानदार मिसाल
मंदिर की बनावट में प्रतिहारकालीन स्थापत्य शैली की झलक दिखाई देती है। इसकी संरचना में भव्य प्रवेश द्वार, मंडप, गर्भगृह और ऊंचा शिखर शामिल हैं। पत्थरों पर की गई बारीक नक्काशी और मूर्तियां इसकी ऐतिहासिक और कलात्मक महत्ता को दर्शाती हैं।
मंदिर परिसर में भगवान शांतिनाथ, भगवान पार्श्वनाथ और चक्रेश्वरी देवी सहित कई देवी-देवताओं की मूर्तियां उकेरी गई हैं। इसके अलावा यक्ष-यक्षिणियों की कलात्मक प्रतिमाएं भी यहां मौजूद हैं। इन मूर्तियों की बारीक कारीगरी उस समय के शिल्पकारों की दक्षता और कला के प्रति समर्पण को प्रदर्शित करती है।
हर पत्थर की होगी अलग पहचान
ASI की संरक्षण योजना के तहत मंदिर को खोलने से पहले उसकी मौजूदा स्थिति का विस्तृत रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा। प्रत्येक पत्थर को क्रमवार चिह्नित किया जाएगा, ताकि दोबारा निर्माण के दौरान उसे सही स्थान पर लगाया जा सके। मंदिर की नक्काशी, मूर्तियों और स्थापत्य हिस्सों की तस्वीरों तथा अन्य तकनीकी विवरणों को भी सुरक्षित रखा जाएगा।
इस तरह की प्रक्रिया में सबसे बड़ी चुनौती मंदिर के मूल स्वरूप और उसकी ऐतिहासिक विशेषताओं को बिना नुकसान पहुंचाए सुरक्षित रखना है। इसलिए हर चरण में सावधानी और तकनीकी विशेषज्ञता की जरूरत होगी।
ऐतिहासिक धरोहर को बचाने की कोशिश
विदिशा और ग्यारसपुर क्षेत्र प्राचीन मंदिरों तथा पुरातात्विक अवशेषों के लिए प्रसिद्ध हैं। ऐसे में 1,100 साल पुराने इस जैन मंदिर का संरक्षण क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत को सुरक्षित रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
अब नजर इस बात पर रहेगी कि ASI की संरक्षण प्रक्रिया किस तरह आगे बढ़ती है और मंदिर को दोबारा स्थापित करते समय उसकी मूल वास्तुकला तथा नक्काशी को किस हद तक सुरक्षित रखा जा पाता है।