नई दिल्ली - भारत में पेट्रोल और डीजल के विकल्प के रूप में जैविक ईंधन को बढ़ावा देने की दिशा में लगातार नए प्रयोग किए जा रहे हैं। पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने के बाद अब डीजल में भी एक नए प्रकार के जैविक ईंधन के इस्तेमाल की तैयारी चल रही है। केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने जानकारी दी है कि भारत में डीजल के साथ आइसोब्यूटेनॉल मिलाने का प्रयोग किया जा रहा है।
हालांकि, इस परीक्षण की अंतिम रिपोर्ट अभी सामने नहीं आई है। गडकरी ने कहा कि यदि यह तकनीक सफल रहती है तो देश को पारंपरिक ईंधन पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। उन्होंने जैविक ईंधन, वैकल्पिक ऊर्जा और कचरे से उपयोगी संसाधन तैयार करने की संभावनाओं पर भी विस्तार से चर्चा की।
डीजल में 15 प्रतिशत आइसोब्यूटेनॉल मिलाने का परीक्षण
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने केपीएमजी के एक कार्यक्रम में बताया कि भारत में डीजल के साथ आइसोब्यूटेनॉल मिलाने की दिशा में प्रयोग जारी है। उन्होंने कहा कि डीजल में 15 प्रतिशत आइसोब्यूटेनॉल मिलाने की संभावना पर काम किया जा रहा है। फिलहाल इस परीक्षण के परिणामों का इंतजार है।
गडकरी के मुताबिक, देश में अब ऐसे इंजन भी तैयार होने लगे हैं जो आइसोब्यूटेनॉल जैसे वैकल्पिक ईंधन पर चल सकते हैं। ऐसे में यह तकनीक भविष्य में परिवहन क्षेत्र के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। हालांकि, इसके व्यावसायिक इस्तेमाल से पहले इंजन की क्षमता, ईंधन की गुणवत्ता और उत्सर्जन जैसे पहलुओं का परीक्षण जरूरी होगा।
टूटे चावल, गन्ने और मक्का से तैयार हो रहा एथेनॉल
नितिन गडकरी ने एथेनॉल उत्पादन के विभिन्न स्रोतों का उल्लेख करते हुए बताया कि इसे टूटे चावल, गन्ने, मक्का और बांस जैसे कृषि उत्पादों से तैयार किया जा सकता है। उन्होंने जैविक ईंधन के उत्पादन को किसानों की आय और कृषि क्षेत्र के लिए लाभकारी बताया।
उनका कहना है कि कृषि उत्पादों से ईंधन तैयार करने से किसानों के लिए अतिरिक्त बाजार विकसित हो सकता है। गन्ने के रस से एथेनॉल के साथ आइसोब्यूटेनॉल बनाने की संभावनाओं पर भी काम किया जा सकता है। इससे देश में वैकल्पिक ईंधन के उत्पादन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
विमानन क्षेत्र में भी जैविक ईंधन के इस्तेमाल की तैयारी
गडकरी ने विमानन क्षेत्र में जैविक ईंधन के प्रयोग का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि एविएशन बायोफ्यूल को लेकर कई सफल परीक्षण किए जा चुके हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस दिशा में चर्चा तेज हो रही है।
उन्होंने कहा कि विमानन ईंधन में एथेनॉल के इस्तेमाल की संभावनाओं पर भी विचार किया जा रहा है। इस दिशा में 18 देशों में प्रयोग किए जाने की जानकारी उन्होंने दी। हालांकि, विमानन क्षेत्र में किसी भी नए ईंधन के इस्तेमाल के लिए सुरक्षा, तकनीकी मानकों और अंतरराष्ट्रीय प्रमाणन की प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
कार्बन डाइऑक्साइड से यूरिया बनाने की तकनीक पर जोर
अपने संबोधन में केंद्रीय मंत्री ने कार्बन डाइऑक्साइड को पर्यावरण के सामने मौजूद बड़ी चुनौतियों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि इस गैस को केवल प्रदूषण का कारण मानने के बजाय उपयोगी संसाधन के रूप में बदलने की तकनीकों पर भी काम किया जाना चाहिए।
गडकरी ने एक शोध का हवाला देते हुए बताया कि कार्बन डाइऑक्साइड में हाइड्रोजन मिलाकर यूरिया तैयार किया जा सकता है। उनके अनुसार, यदि यह तकनीक बड़े स्तर पर सफल होती है तो भारत को यूरिया के आयात पर होने वाले भारी खर्च में राहत मिल सकती है। उन्होंने यूरिया आयात पर सालाना करीब 5.5 से 6 लाख करोड़ रुपये के बोझ का उल्लेख किया। इस तकनीक के व्यावसायिक इस्तेमाल की दिशा में एनटीपीसी की ओर से टेंडर जारी किए जाने की जानकारी भी उन्होंने दी।
डीएमई से एलपीजी आयात कम करने की संभावना
नितिन गडकरी ने वैकल्पिक ईंधन के एक अन्य विकल्प डाइमेथिल ईथर (डीएमई) का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि कार्बन डाइऑक्साइड और हाइड्रोजन की मदद से डीएमई तैयार करने की संभावनाएं मौजूद हैं।
उनके मुताबिक, अमेरिका में एलपीजी के साथ डीएमई के मिश्रण का इस्तेमाल किया जाता है। भारत में भी इस तरह के प्रयोग को आगे बढ़ाया जाए तो घरेलू ईंधन की जरूरतों को पूरा करने और आयात पर निर्भरता घटाने में मदद मिल सकती है।
वेस्ट टू वेल्थ से ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव की उम्मीद
गडकरी ने अपने संबोधन में 'वेस्ट टू वेल्थ' यानी कचरे को उपयोगी संपत्ति में बदलने की अवधारणा पर विशेष जोर दिया। उनका मानना है कि कृषि अवशेषों, औद्योगिक अपशिष्ट और कार्बन उत्सर्जन से उपयोगी उत्पाद तैयार करने की तकनीकें भारत के लिए नए आर्थिक अवसर पैदा कर सकती हैं।
कुल मिलाकर, नितिन गडकरी का जोर पेट्रोल और डीजल के पारंपरिक विकल्प विकसित करने के साथ-साथ जैविक ईंधन और नई तकनीकों को बढ़ावा देने पर है। हालांकि, आइसोब्यूटेनॉल, डीएमई और कार्बन डाइऑक्साइड से यूरिया बनाने जैसी योजनाओं की वास्तविक सफलता परीक्षण और व्यावसायिक क्रियान्वयन के बाद ही स्पष्ट होगी।