अरावली पर्वतमाला की परिभाषा को लेकर चल रही कानूनी और पर्यावरणीय कवायद अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गई है, जहां केवल पहाड़ियों की ऊंचाई को संरक्षण का आधार मानना पर्याप्त नहीं माना जा रहा। सर्वोच्च न्यायालय की ओर से गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति ने 31 अगस्त 2026 को दाखिल अपनी अनुपालन रिपोर्ट में अंतिम रिपोर्ट तैयार करने के लिए 6 महीने का अतिरिक्त समय मांगा है। समिति ने कहा है कि अरावली का वैज्ञानिक सीमांकन किसी एक भू-आकृतिक या ऊंचाई आधारित कसौटी से नहीं किया जा सकता। इसके लिए भूगर्भीय संरचना, जल प्रणालियों, वन क्षेत्र, जैव विविधता, पारिस्थितिक संपर्क, खनिज संसाधनों और स्थानीय आजीविका सहित कई परस्पर जुड़े पहलुओं का अध्ययन जरूरी है। समिति ने अंतिम रिपोर्ट के लिए 28 फरवरी 2027 तक समय मांगा है।
समिति का यह रुख इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अरावली केवल अलग-अलग ऊंचाई वाली पहाड़ियों का समूह नहीं है, बल्कि हजारों वर्षों में विकसित हुआ एक व्यापक प्राकृतिक भू-दृश्य है। कई छोटी पहाड़ियां, पहाड़ी टीलों, जलग्रहण क्षेत्रों और वन क्षेत्रों का महत्व उनकी ऊंचाई से अधिक उनके आसपास के प्राकृतिक तंत्र से जुड़ा हो सकता है। समिति के प्रारंभिक क्षेत्रीय अध्ययन में भी अरावली के बड़े हिस्से को छोटे-बड़े पर्वतीय उभारों से जुड़ा ऐसा भू-दृश्य पाया गया, जिसमें जल, जैव विविधता और सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व एक-दूसरे से जुड़े हैं। यही वजह है कि समिति अब संरक्षण की सीमा तय करने के लिए बहुआयामी वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने पर जोर दे रही है।
नवंबर 2025 में 100 मीटर के पैमाने को मिली थी मंजूरी
अरावली की परिभाषा का मौजूदा विवाद नवंबर 2025 के उस न्यायिक फैसले से जुड़ा है, जिसमें 100 मीटर या उससे अधिक स्थानीय ऊंचाई वाली भू-आकृति को अरावली पहाड़ी मानने की व्यवस्था को स्वीकार किया गया था। संबंधित व्यवस्था में 500 मीटर के दायरे में स्थित ऐसी पहाड़ियों को अरावली श्रेणी का हिस्सा मानने का प्रावधान भी था। उस समय इस व्यवस्था का उद्देश्य अलग-अलग राज्यों में अरावली की पहचान और खनन नियमन के लिए एक समान तथा स्पष्ट मानक तैयार करना बताया गया था। केंद्र सरकार ने भी तर्क दिया था कि यह व्यवस्था पहाड़ियों और उनके सहायक ढलानों को संरक्षण के दायरे में रखने तथा अवैध खनन पर नियंत्रण मजबूत करने के लिए तैयार की गई थी।
लेकिन इस व्यवस्था के सामने आते ही पर्यावरण विशेषज्ञों और संरक्षण समूहों ने इसके संभावित प्रभावों पर गंभीर सवाल उठाए। चिंता का सबसे बड़ा कारण यह था कि यदि अरावली को मुख्यतः 100 मीटर की ऊंचाई से पहचाना गया तो अपेक्षाकृत कम ऊंचाई वाले ऐसे अनेक भू-भाग संरक्षण से बाहर हो सकते हैं, जिनका पर्यावरणीय महत्व स्वतंत्र रूप से या आसपास की पहाड़ियों के साथ मिलकर बहुत अधिक है। भारतीय वन सर्वेक्षण से जुड़े पुराने आकलनों में भी 100 मीटर की कसौटी के संभावित प्रभावों को लेकर चिंता सामने आई थी। इसी बहस ने यह मूल प्रश्न खड़ा किया कि क्या किसी प्राचीन पर्वतमाला की पारिस्थितिक पहचान को केवल एक संख्यात्मक सीमा में समेटा जा सकता है।
दिसंबर में सर्वोच्च न्यायालय ने पुराने फैसले पर लगाई रोक
100 मीटर की परिभाषा को लेकर उठे व्यापक सवालों के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने दिसंबर 2025 में नवंबर के फैसले और संबंधित समिति की सिफारिशों पर रोक लगा दी थी। अदालत ने माना कि मामले में ऐसी महत्वपूर्ण अस्पष्टताएं और संभावित नियामकीय खामियां हैं, जिनका समाधान किए बिना नई व्यवस्था को लागू करना अरावली की पारिस्थितिक अखंडता के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। इसके साथ ही अदालत ने एक नई उच्चाधिकार प्राप्त विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश दिया, जिसे पहले की रिपोर्ट और अरावली की परिभाषा का व्यापक पुनर्मूल्यांकन करना है।
अदालत की चिंता केवल यह जानने तक सीमित नहीं थी कि कौन-सी पहाड़ी 100 मीटर ऊंची है और कौन-सी नहीं। उसे यह भी देखना था कि प्रस्तावित सीमांकन से कितने क्षेत्र संरक्षण से बाहर होंगे, क्या पहाड़ियों के बीच के भू-भाग भी पारिस्थितिक रूप से जुड़े हुए हैं और क्या ऐसी जगहों पर खनन या अन्य गतिविधियों से पूरे पर्वतीय तंत्र को नुकसान पहुंच सकता है। अदालत ने इसी कारण नई समिति से व्यापक और समग्र अध्ययन कराने को कहा। दिसंबर के आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया था कि अंतिम स्थिति स्पष्ट होने तक अरावली क्षेत्र में नए खनन पट्टों और मौजूदा पट्टों के नवीनीकरण के संबंध में अदालत की अनुमति के बिना आगे नहीं बढ़ा जा सकता।
नई समिति अरावली को एक जुड़े हुए प्राकृतिक तंत्र के रूप में देख रही
नई उच्चाधिकार प्राप्त समिति ने अब अरावली की पहचान के लिए जिस दृष्टिकोण को सामने रखा है, उसे ‘अरावली पारिस्थितिक भू-दृश्य’ के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसका मूल विचार यह है कि पर्वतमाला को केवल अलग-अलग पहाड़ियों की भौतिक आकृति के आधार पर नहीं, बल्कि उनसे जुड़े वन, जलग्रहण क्षेत्र, भूजल पुनर्भरण क्षेत्र, आर्द्रभूमि, जैव विविधता, पारिस्थितिक गलियारों और मानव आजीविका के व्यापक संबंधों के साथ देखा जाए। समिति का मानना है कि ऐसा बहुआयामी अध्ययन अरावली की वास्तविक पर्यावरणीय भूमिका को अधिक वैज्ञानिक ढंग से सामने ला सकता है। इसके आधार पर अलग-अलग क्षेत्रों के लिए संरक्षण और प्रबंधन की अलग आवश्यकताओं को भी समझा जा सकता है।
समिति ने अगस्त 2026 में क्षेत्रीय अध्ययन भी किया और 6 से 11 अगस्त के बीच अरावली के विभिन्न हिस्सों का प्रत्यक्ष आकलन किया। उसके अनुसार इस अध्ययन में अरावली के बड़े हिस्से ऐसे जुड़े हुए भू-दृश्य के रूप में सामने आए, जिनमें जल विज्ञान, जैव विविधता और सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व परस्पर संबंधित हैं। समिति ने यह भी संकेत दिया कि अलग-थलग दिखाई देने वाली छोटी पहाड़ियां या पहाड़ी टीलों का भी अपना पारिस्थितिक, जल संबंधी, सौंदर्यात्मक या सांस्कृतिक महत्व हो सकता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि भविष्य की परिभाषा में केवल ऊंचाई नहीं, बल्कि किसी भू-भाग की समग्र पारिस्थितिक भूमिका भी निर्णायक हो सकती है।
680 सुझावों ने बढ़ाई अध्ययन की व्यापकता
अरावली की नई परिभाषा तैयार करने की प्रक्रिया में विभिन्न पक्षों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। समिति को 26 अगस्त तक करीब 680 सुझाव और आपत्तियां प्राप्त हो चुकी थीं। इनमें किसान, स्थानीय समुदाय, निवासी, पर्यावरण एवं नागरिक समूह, सरकारी संस्थाएं तथा खनन क्षेत्र से जुड़े पक्ष शामिल हैं। इतनी बड़ी संख्या में प्राप्त प्रतिक्रियाएं यह बताती हैं कि अरावली की परिभाषा का असर केवल वन और पहाड़ियों तक सीमित नहीं होगा, बल्कि खेती, आजीविका, खनन, स्थानीय अर्थव्यवस्था, जल संसाधनों और भविष्य की भूमि उपयोग नीति पर भी पड़ेगा। इसलिए समिति के सामने वैज्ञानिक अध्ययन के साथ सामाजिक और आर्थिक प्रभावों का आकलन करना भी आवश्यक हो गया है।
समिति की ओर से और समय मांगने की एक बड़ी वजह यही व्यापकता है। रिपोर्ट तैयार करने से पहले भू-स्थानिक विश्लेषण, क्षेत्रीय सत्यापन, विशेषज्ञ परीक्षण और हितधारकों की राय को एक साथ जोड़ना होगा। समिति ने संकेत दिया है कि क्षेत्रफल या पहाड़ियों की संख्या से जुड़े आंकड़े तभी सार्वजनिक किए जाने चाहिए, जब उनके पीछे इस्तेमाल किए गए आंकड़े, पद्धति और विश्लेषण के मानकों का स्वतंत्र रूप से परीक्षण हो चुका हो। ऐसा इसलिए क्योंकि सीमांकन में मामूली बदलाव भी संरक्षण क्षेत्र, खनन नियमन और स्थानीय लोगों के अधिकारों पर व्यापक प्रभाव डाल सकते हैं।
खनन का सवाल अब भी सबसे संवेदनशील मुद्दा
अरावली विवाद के केंद्र में खनन का प्रश्न बना हुआ है, क्योंकि इस क्षेत्र में खनिज संसाधनों और पारिस्थितिक संरक्षण के बीच लंबे समय से टकराव रहा है। नवंबर 2025 के न्यायिक ढांचे में भी टिकाऊ खनन की व्यवस्था तैयार करने और अवैध खनन को रोकने पर जोर दिया गया था। अदालत ने पूरे अरावली भू-दृश्य के लिए टिकाऊ खनन प्रबंधन योजना तैयार करने का निर्देश दिया था, जिसमें खनन योग्य क्षेत्रों, पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील इलाकों, संरक्षण प्राथमिकता वाले क्षेत्रों और पुनर्स्थापन की जरूरत वाले क्षेत्रों की पहचान की जानी थी।
दिसंबर 2025 के बाद स्थिति और सतर्क हो गई है। अदालत की रोक का उद्देश्य यही सुनिश्चित करना है कि अरावली की नई परिभाषा और उसके पर्यावरणीय प्रभावों पर पर्याप्त वैज्ञानिक जांच होने से पहले ऐसे प्रशासनिक फैसले न लिए जाएं, जिनसे प्राकृतिक भू-दृश्य को स्थायी नुकसान हो सकता है। खनन गतिविधियों से जुड़े जल निकासी तंत्र, भूजल, स्थलाकृति और जैव विविधता पर संभावित प्रभावों की जांच भी समिति के अध्ययन का हिस्सा है। ऐसे में आने वाली अंतिम रिपोर्ट यह तय करने में महत्वपूर्ण हो सकती है कि भविष्य में अरावली के किन क्षेत्रों में पूर्ण संरक्षण जरूरी होगा और किन क्षेत्रों में कठोर शर्तों के साथ आर्थिक गतिविधियों पर विचार किया जा सकता है।
28 फरवरी 2027 तक सामने आ सकता है नया संरक्षण ढांचा
समिति का अतिरिक्त समय मांगना यह संकेत देता है कि अरावली की परिभाषा अब जल्दबाजी में तय करने के बजाय वैज्ञानिक प्रमाणों के व्यापक परीक्षण के बाद तैयार की जाएगी। प्रस्तावित पारिस्थितिक भू-दृश्य ढांचा यदि अंतिम रूप लेता है तो अरावली को केवल ऊंची पहाड़ियों की शृंखला के रूप में देखने के बजाय एक समग्र प्राकृतिक तंत्र के रूप में समझने की दिशा मजबूत हो सकती है। इसमें भूगर्भीय संरचना से लेकर जल प्रणालियों, वन क्षेत्रों, जैव विविधता, पारिस्थितिक संपर्क और स्थानीय आजीविका तक को एक ही व्यापक तस्वीर में शामिल करने का प्रयास होगा।
अब अगला महत्वपूर्ण पड़ाव 28 फरवरी 2027 तक तैयार होने वाली समिति की व्यापक रिपोर्ट होगी। हालांकि समयसीमा के विस्तार के बाद भी अंतिम निर्णय केवल समिति की रिपोर्ट पर निर्भर नहीं होगा, क्योंकि उसके निष्कर्षों पर सर्वोच्च न्यायालय में आगे विचार होना है। अरावली की भौगोलिक और पर्यावरणीय जटिलता को देखते हुए आने वाला फैसला उत्तर-पश्चिम भारत के जल संसाधनों, जैव विविधता, मरुस्थलीकरण नियंत्रण और खनन नीति के लिए दूरगामी महत्व रख सकता है। फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि अरावली को बचाने की बहस अब ‘100 मीटर’ की एक सीमा से आगे बढ़कर पूरे पारिस्थितिक तंत्र की वैज्ञानिक पहचान और संरक्षण तक पहुंच गई है।