नई दिल्ली - योग गुरु बाबा रामदेव ने देश की लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था को लेकर चल रही बहस के बीच अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि भारत में सत्ता परिवर्तन और राजनीतिक बदलाव के लिए एक संवैधानिक व्यवस्था मौजूद है, जिसका सभी राजनीतिक दलों और नागरिकों को सम्मान करना चाहिए। रामदेव के मुताबिक, व्यवस्था में खामियां होने पर आंदोलन और सुधार की मांग की जा सकती है, लेकिन यह सब संविधान और लोकतंत्र की सीमाओं के भीतर होना चाहिए।
‘संवैधानिक संस्थाओं को न मानना अराजकता’
बाबा रामदेव ने कहा कि देश में लोकतांत्रिक और संवैधानिक व्यवस्था को लेकर सड़कों से लेकर संसद तक बहस और हंगामा देखने को मिल रहा है। उन्होंने दावा किया कि कुछ लोग देश में ‘रिजीम चेंज’ यानी सत्ता व्यवस्था में बदलाव चाहते हैं। रामदेव ने कहा कि भारत एक संवैधानिक लोकतंत्र है और इस व्यवस्था को स्वीकार करना जरूरी है। उनके अनुसार, संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान नहीं करना अराजकता को बढ़ावा दे सकता है। उन्होंने राजनीतिक दलों से मौजूदा व्यवस्था के नियमों और प्रक्रियाओं का पालन करने की बात कही।
सत्ता हासिल करने के लिए व्यवस्था का सम्मान जरूरी
योग गुरु ने अपने बयान में कहा कि किसी भी राजनीतिक पार्टी को देश में शासन करना है, तो उसे निर्धारित लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सम्मान करना होगा। लोकतंत्र में सत्ता हासिल करने और सरकार चलाने के लिए संवैधानिक नियम तय हैं। उनकी टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब देश में राजनीतिक व्यवस्था, चुनाव और संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका को लेकर विभिन्न पक्षों की ओर से बयान दिए जा रहे हैं। रामदेव ने अपने विचार रखते हुए व्यवस्था के भीतर रहकर राजनीतिक बदलाव करने पर जोर दिया।
खामियों पर आंदोलन और सुधार का समर्थन
बाबा रामदेव ने यह भी कहा कि यदि किसी को व्यवस्था में खामियां दिखाई देती हैं, तो उसके खिलाफ आंदोलन किए जा सकते हैं और सुधार की मांग उठाई जा सकती है। हालांकि, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विरोध और आंदोलन संविधान तथा लोकतांत्रिक मर्यादाओं के दायरे में होने चाहिए। उनके बयान का आशय यह है कि लोकतंत्र में असहमति और विरोध की गुंजाइश बनी रहनी चाहिए, लेकिन राजनीतिक मांगों को आगे बढ़ाने के लिए संवैधानिक प्रक्रिया का पालन भी जरूरी है।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर फिर चर्चा
रामदेव की टिप्पणी ने ‘रिजीम चेंज’ और संवैधानिक संस्थाओं के सम्मान को लेकर जारी चर्चा में एक और पक्ष जोड़ा है। उनके मुताबिक, लोकतांत्रिक व्यवस्था में बदलाव की मांग करना और सुधार के लिए आवाज उठाना संभव है, लेकिन इसके लिए संविधान में निर्धारित प्रक्रियाओं का सम्मान किया जाना चाहिए। फिलहाल, उनका बयान राजनीतिक बदलाव, विरोध प्रदर्शनों और संवैधानिक मर्यादाओं को लेकर चल रही बहस के संदर्भ में देखा जा रहा है।
प्रशांत भूषण ने कहा- ‘हां, हम सत्ता परिवर्तन चाहते हैं’
CJP के विरोध प्रदर्शन के बीच वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने भी ‘रिजीम चेंज’ को लेकर बयान दिया था। 15 अक्टूबर को दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने कहा कि वे सत्ता परिवर्तन चाहते हैं और लोकतंत्र में सरकार बदलने की मांग करना नागरिकों का अधिकार है। भूषण ने तर्क दिया कि यदि चुनावी लोकतंत्र को कमजोर किया जाता है, तो सरकार के प्रति असंतोष व्यक्त करना अपराध नहीं माना जाना चाहिए।
उनकी इस टिप्पणी पर भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी। भाजपा नेताओं ने आरोप लगाया कि विरोध प्रदर्शनों के पीछे सरकार बदलने का उद्देश्य है। वहीं, भूषण ने अपने बयान में सत्ता परिवर्तन की मांग को लोकतांत्रिक अधिकार से जोड़कर पेश किया।