पूर्वोत्तर संत मणिकंचन सम्मेलन को संबोधित करते हुए RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि, हर देश की अपनी अनूठी जीवन शैली होती है, जो उसकी संस्कृति से आती है। उन्होंने अपने संबोधन में आगे कहा कि, भारत की संस्कृति में 'एकम सत् विप्रा बहुधा वदन्ति' का सिद्धांत प्रतिबिंबित होता है। सर्व समावेशी परंपरा केवल विश्व में भारत देश में ही मौजूद है।
समाज को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी
RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि, वर्तमान समय में विश्व के देशों को शांति और सह अस्तित्व का संदेश देने के लिए मजबूती से खड़ा होना चाहिए। महान कार्यों को पूरा करने के लिए हमारे समाज में आध्यात्मिक गुरुओं को आगे आना होगा। उन्होंने अपने इस संबोधन में कहा कि, हमें अपनी विविधता का पालन करते हुए अपनी एकता को आगे बढ़ाना होगा। लोगों को सेवा,शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और रोजगार के माध्यम से समाज को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी।
मूल्यों, रीति रिवाजों की जागरूकता की जरूरत
भागवत ने कहा कि, भारत के आध्यात्मिक मूल्यों और रीति रिवाजों को बनाए रखने के लिए परिवारों में राष्ट्रीय जागरूकता की जरूरत हैं। इस दौरान उन्होंने सभी आध्यात्मिक नेताओं से इस संदेश और मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का आग्रह है। RSS प्रमुख ने कहा कि, जिस तरह असम के महान संत श्रीमंत शंकरदेव ने सामाजिक सुधार लाकर अपने महान जीवन का उदाहरण दिया। उसी तरह हम सभी को अपने परोपकारी व्यवहार के माध्यम से अपने समाज के भीतर विभिन्न सामाजिक बुराइयों को खत्म करना होगा।
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