नई दिल्ली. चीन की घटती आबादी और तेजी से बढ़ती बुजुर्ग जनसंख्या उसके सामने बड़ी आर्थिक और सामाजिक चुनौती बन रही है। अमेरिकी विशेषज्ञ माइकल रुबिन ने आशंका जताई है कि इन दबावों के बीच चीन भारत के साथ सीमा पर तनाव बढ़ा सकता है। उन्होंने तर्क दिया कि ताइवान पर सैन्य कार्रवाई के मुकाबले अरुणाचल प्रदेश में आक्रामकता दिखाना चीन को कम जोखिम वाला विकल्प लग सकता है। रुबिन के इस आकलन ने भारत-चीन सीमा विवाद और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। जनसांख्यिकीय दबावों को रणनीतिक निर्णयों से जोड़कर देखने का उनका दृष्टिकोण महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है।
एक बच्चे की नीति का दीर्घकालिक असर
चीन ने 1980 से 2016 तक एक बच्चे की नीति लागू की थी। इसका उद्देश्य जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करना था लेकिन लंबे समय में इससे कम जन्म दर और तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी जैसी समस्याएं गहरी हुईं। अब सरकार जन्म दर बढ़ाने की कोशिश कर रही है लेकिन इसके नतीजे सीमित रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार भारत 2023 में आबादी के मामले में चीन से आगे निकल गया था। रुबिन ने अनुमान जताया है कि वर्ष 2100 तक चीन की आबादी घटकर करीब 63.3 करोड़ रह सकती है। यह भविष्य का अनुमान है निश्चित आंकड़ा नहीं। जनसंख्या असंतुलन चीन की आर्थिक वृद्धि और सैन्य क्षमता दोनों को प्रभावित कर सकता है।
घटती आबादी और बाहरी संघर्ष का संबंध
रुबिन ने रूस और ईरान के उदाहरण देते हुए तर्क दिया है कि जनसांख्यिकीय दबाव से जूझ रहे देश कभी-कभी बाहरी संघर्षों की ओर बढ़ सकते हैं। रूस ने जॉर्जिया और यूक्रेन में सैन्य कार्रवाई की जबकि ईरान के नेतृत्व ने भी घटती जन्म दर को लेकर चिंता जताई थी। हालांकि किसी देश की घटती आबादी और उसके युद्ध शुरू करने के बीच सीधा संबंध स्थापित नहीं है। सैन्य कार्रवाई के पीछे राजनीतिक क्षेत्रीय और रणनीतिक कारण भी महत्त्वपूर्ण होते हैं। रुबिन का तर्क यह है कि आंतरिक दबाव कभी-कभी बाहरी आक्रामकता को प्रोत्साहित कर सकते हैं। विशेषज्ञ इस संबंध को सावधानी से देखने की सलाह देते हैं।
ताइवान से पहले अरुणाचल का विकल्प
रुबिन के मुताबिक ताइवान पर हमला करने की स्थिति में चीन को अमेरिका के सैन्य हस्तक्षेप और कठिन समुद्री अभियान जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। इसके विपरीत भारत के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव बढ़ाना चीन को अपेक्षाकृत कम जोखिम वाला विकल्प लग सकता है। उनके आकलन में अरुणाचल प्रदेश लद्दाख और सिलीगुड़ी गलियारा रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण क्षेत्र हैं। इन क्षेत्रों में सीमित कार्रवाई से चीन अपनी आंतरिक समस्याओं से ध्यान भटकाने का प्रयास कर सकता है। रुबिन का यह विश्लेषण भारत की पूर्वी सीमा की संवेदनशीलता को रेखांकित करता है।
भारत को सैन्य तैयारी बढ़ाने की सलाह
भारत के पूर्व सैन्य अधिकारी ने भी चीन से संभावित खतरे को देखते हुए सैन्य क्षमताएं मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया है। उनके अनुसार भारत को सीमावर्ती क्षेत्रों में अपनी तैयारियां बढ़ानी चाहिए और कमजोरियों को समय रहते दूर करना चाहिए। रुबिन ने रूस-यूक्रेन युद्ध का हवाला देते हुए कहा कि बड़े संघर्षों की आशंका को कई बार कम करके आंका जाता है। उनका मानना है कि भारत को उत्तरी और पूर्वी सीमाओं पर संभावित चुनौतियों के लिए तैयार रहना चाहिए। सैन्य बुनियादी ढांचे और रसद व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी है।
रणनीतिक क्षेत्रों की संवेदनशीलता
अरुणाचल प्रदेश लद्दाख और सिलीगुड़ी गलियारे को रुबिन ने विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण बताया है। सिलीगुड़ी गलियारा भारत के पूर्वोत्तर को मुख्य भूमि से जोड़ने वाला संकीर्ण गलियारा है जिसकी सुरक्षा अत्यंत जरूरी है। अरुणाचल प्रदेश में चीन की दावेदारी लंबे समय से चली आ रही है। इन क्षेत्रों में किसी भी तरह की आक्रामकता पूरे क्षेत्रीय संतुलन को प्रभावित कर सकती है। भारत इन सीमाओं पर अपनी सैन्य उपस्थिति पहले से बढ़ा चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि निरंतर निगरानी और तैयारी बनाए रखनी चाहिए।
आंतरिक दबाव और बाहरी रणनीति
चीन की घटती आबादी आर्थिक विकास दर और सामाजिक सुरक्षा प्रणाली पर दबाव बना रही है। बुजुर्ग आबादी बढ़ने से पेंशन और स्वास्थ्य सेवाओं का बोझ बढ़ रहा है। रुबिन का तर्क है कि ऐसे आंतरिक संकट के समय कुछ देश बाहरी संघर्ष के जरिए राष्ट्रवाद को मजबूत करने का प्रयास करते हैं। हालांकि यह अनिवार्य नहीं है और कई अन्य कारक भी निर्णयों को प्रभावित करते हैं। भारत के लिए सतर्क रहना और अपनी सैन्य तथा कूटनीतिक तैयारियों को अद्यतन रखना जरूरी है। सीमा पर शांति बनाए रखने के साथ-साथ क्षमता निर्माण जारी रहना चाहिए।