नई दिल्ली में राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग यानी एनएचआरसी के 33वें स्थापना दिवस समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सोमवार को कहा कि एनएचआरसी पीड़ितों के लिए भरोसेमंद पता बन चुका है। उन्होंने विज्ञान भवन में आयोजित समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि 33 वर्ष पहले संसद ने इस आयोग का गठन मानव गरिमा की रक्षा के लिए किया था। तब से यह एक नए विचार से आगे बढ़कर पीड़ितों के लिए विश्वसनीय मंच बन गया है। सीजेआई ने कहा कि अगर संविधान एक वादा है तो आयोग उसके रखवालों में से एक है। यह वहां जाता है जहां अदालत आसानी से नहीं पहुंच सकती। यह उन लोगों की बात सुनता है जो आसानी से बोल नहीं सकते और बिना मांगे खुद से कार्रवाई कर सकता है।
मानव अधिकार संरक्षण का व्यापक दायरा
सीजेआई ने हिरासत में यातना या मौतों बंधुआ मजदूरी सिलिकोसिस के औद्योगिक संपर्क और हाशिए पर पड़े समुदायों के अधिकारों की रक्षा से जुड़े मामलों में एनएचआरसी के हस्तक्षेपों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ये हस्तक्षेप दिखाते हैं कि मानव अधिकार संरक्षण केवल उल्लंघन की पहचान करने से आगे जाना चाहिए। असली मापदंड केवल तय किए गए मामलों की संख्या नहीं बल्कि उन लोगों की आवाज को सुनना है जो खुद को आसानी से नहीं सुना पाते। आयोग की भूमिका पीड़ितों तक पहुंचने और उनकी समस्याओं को सार्वजनिक दृष्टि में लाने की है। इस प्रक्रिया में मानव गरिमा की रक्षा केंद्रीय लक्ष्य रहता है।
आयोग का प्रदर्शन और आंकड़े
सीजेआई ने बताया कि अपने 33 वर्षों में एनएचआरसी ने 24 लाख से अधिक मामले दर्ज किए हैं और 23 लाख से अधिक मामलों का निपटारा किया है। निपटान दर 98 प्रतिशत से अधिक रही है। उन्होंने कहा कि ये आंकड़े केवल संस्थागत उत्पादन नहीं बल्कि उन कई उदाहरणों को दर्शाते हैं जिनमें गंभीर उल्लंघन को सार्वजनिक दृष्टि में लाया गया। उच्च निपटान दर आयोग की कार्यक्षमता को रेखांकित करती है। मामलों के निपटारे से पीड़ितों को न्याय दिलाने की प्रक्रिया मजबूत हुई है। आयोग की सक्रियता ने मानव अधिकार संरक्षण को व्यावहारिक रूप दिया है।
संविधान और अनुच्छेद 21 का विस्तार
सीजेआई ने कहा कि वर्षों में मानव अधिकारों का अर्थ स्वयं काफी व्यापक हो गया है। संविधान का अनुच्छेद 21 इस संवैधानिक यात्रा का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की व्याख्या समय के साथ विस्तृत हुई है। आयोग इस विस्तारित समझ को व्यावहारिक रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। मानव गरिमा की रक्षा अब केवल कानूनी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गई है। सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक आयाम भी इसमें शामिल हो गए हैं। आयोग की कार्यप्रणाली इस व्यापक दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करती है।
अध्यक्ष और अन्य वक्ताओं की उपस्थिति
एनएचआरसी अध्यक्ष वी. रामसुब्रमण्यन जो पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश हैं उन्होंने भी समारोह को संबोधित किया। अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने भी अपने विचार रखे। समारोह में आयोग की उपलब्धियों और भविष्य की चुनौतियों पर चर्चा हुई। सीजेआई के संबोधन ने आयोग की स्वतंत्र भूमिका और पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण को रेखांकित किया। स्थापना दिवस के अवसर पर मानव अधिकार संरक्षण की निरंतरता पर जोर दिया गया। आयोग की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए निरंतर प्रयास आवश्यक हैं।