दिल्ली हाईकोर्ट ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई और कथित लाठीचार्ज को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया है। अदालत ने दोनों पक्षों से चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है। साथ ही मामले से जुड़े सभी महत्वपूर्ण सबूत, जैसे CCTV फुटेज, बॉडी कैमरा रिकॉर्डिंग और अन्य डिजिटल रिकॉर्ड, सुरक्षित रखने के निर्देश भी दिए हैं।
चीफ जस्टिस की बेंच ने की सुनवाई
मामले की सुनवाई दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की खंडपीठ ने की। अदालत ने कहा कि पुलिस का जवाब आने के बाद याचिकाकर्ताओं को भी अपना पक्ष रखने के लिए चार सप्ताह का समय दिया जाएगा।
याचिका में क्या लगाए गए आरोप?
याचिका में आरोप लगाया गया है कि जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर पुलिस ने जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया। साथ ही सोनम वांगचुक को प्रदर्शन स्थल से जबरन हटाए जाने को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह कार्रवाई संविधान में दिए गए शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार का उल्लंघन है।
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट में क्या दलील दी?
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एन. हरिहरन और विकास सिंह ने कहा कि प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण था और नागरिक अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग कर रहे थे। उन्होंने अदालत से कहा कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर कथित तौर पर अत्यधिक बल प्रयोग किया, जो कानून और संविधान की भावना के विपरीत है।
हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस से क्या पूछा?
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने दिल्ली पुलिस से पूछा कि यदि पुलिस का मानना था कि वहां गैरकानूनी जमावड़ा था, तो कानून में उससे निपटने की स्पष्ट प्रक्रिया मौजूद है। अदालत ने संकेत दिया कि पुलिस कार्रवाई की वैधानिकता की जांच आवश्यक है।
केंद्र सरकार ने क्या कहा?
केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) राजू ने अदालत में कहा कि यदि किसी व्यक्ति को पुलिस कार्रवाई से शिकायत है, तो वह पहले मजिस्ट्रेट कोर्ट या पुलिस के समक्ष एफआईआर दर्ज कराने की प्रक्रिया अपना सकता है। उन्होंने दलील दी कि यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत सुनवाई योग्य नहीं है।
'याचिका पब्लिसिटी के लिए दायर की गई'
केंद्र सरकार ने यह भी कहा कि याचिका का उद्देश्य केवल प्रचार (पब्लिसिटी) हासिल करना प्रतीत होता है। ASG ने दावा किया कि जिन लोगों के साथ कथित मारपीट हुई, वे स्वयं अदालत के सामने नहीं आए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि घटनास्थल के वीडियो में पुलिसकर्मियों के घायल होने और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं भी दिखाई देती हैं।
'हिंसा होने पर पुलिस कार्रवाई जरूरी'
केंद्र सरकार ने अदालत में कहा कि जहां भी भीड़ हिंसक हो जाती है, वहां पुलिस को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई करनी पड़ती है। सरकार के अनुसार, संबंधित घटनाओं में एफआईआर भी दर्ज की गई हैं और पूरे मामले की जांच कानून के अनुसार की जा रही है।
अब आगे क्या होगा?
दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को चार सप्ताह में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसके बाद याचिकाकर्ता अपना प्रत्युत्तर दाखिल करेंगे और अदालत मामले की अगली सुनवाई में सभी पक्षों की दलीलों पर विचार करेगी।