चंडीगढ़: ₹3.03 करोड़ के चर्चित “डिजिटल अरेस्ट” साइबर फ्रॉड मामले में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए आरोपी को जमानत दे दी है। कोर्ट ने आरोपी की सीमित भूमिका, जांच पूरी होने और लंबी न्यायिक प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए राहत दी।
हाईकोर्ट का फैसला
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट की जस्टिस मनीषा बत्रा की बेंच ने आरोपी विक्रम सिंह की नियमित जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि मामले में उसकी भूमिका सीमित प्रतीत होती है और वह काफी समय से हिरासत में है। कोर्ट ने 10 अप्रैल को दिए आदेश में माना कि आगे की लंबी कैद उचित नहीं है, इसलिए सख्त शर्तों के साथ जमानत दी जा सकती है।
‘डिजिटल अरेस्ट’ का डरावना खेल
इस केस का केंद्र एक रिटायर्ड प्रिंसिपल डॉ. अनीता हैं, जिन्हें कथित तौर पर फोन कॉल और वीडियो कॉल के जरिए “डिजिटल अरेस्ट” में रखा गया। जालसाजों ने खुद को जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर उन्हें गंभीर मामलों में फंसाने की धमकी दी और परिवार को नुकसान पहुंचाने की बात कहकर डराया।
घर में कैद, स्क्रीन के जरिए नियंत्रण
आरोप है कि ठगों ने लगातार वीडियो कॉल के जरिए पीड़िता पर नजर रखी और उन्हें किसी से संपर्क न करने के लिए मजबूर किया। इस मानसिक दबाव के चलते उन्होंने अलग-अलग खातों में करीब ₹3.03 करोड़ ट्रांसफर कर दिए। यह मामला साइबर अपराध के नए और खतरनाक रूप को उजागर करता है।
आरोपी की भूमिका क्या रही
जांच के अनुसार, आरोपी विक्रम सिंह ने ठगी की रकम में से करीब ₹4.26 लाख प्राप्त किए और उसे क्रिप्टोकरेंसी (USDT) में बदलने का काम किया। इसके बदले उसे कमीशन भी मिला। पुलिस का कहना है कि वह इस संगठित नेटवर्क की एक कड़ी था, जो पैसे के ट्रेल को छिपाने में मदद करता था।
कोर्ट ने किन तथ्यों पर दिया जोर
- हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कुछ अहम बिंदुओं को ध्यान में रखा
- आरोपी की भूमिका सीमित थी और वह सीधे पीड़िता से संपर्क में नहीं था
- वह 18 फरवरी 2025 से हिरासत में था
- मामले की जांच पूरी हो चुकी है
- ट्रायल में समय लग सकता है
- इन सभी पहलुओं को देखते हुए कोर्ट ने जमानत मंजूर कर ली
कोर्ट में क्या हुई बहस
बचाव पक्ष ने दलील दी कि आरोपी का इस ठगी की मूल साजिश से सीधा संबंध नहीं है और वह सिर्फ बाद में पैसे को क्रिप्टो में बदलने तक सीमित था। वहीं सरकारी पक्ष ने इसे एक संगठित साइबर फ्रॉड बताते हुए कहा कि हर कड़ी इस अपराध में अहम भूमिका निभाती है।
साइबर अपराध का नया चेहरा
यह मामला दिखाता है कि साइबर ठगी अब सिर्फ धोखे तक सीमित नहीं रही, बल्कि डर और मानसिक दबाव के जरिए लोगों को पूरी तरह नियंत्रित किया जा रहा है। “डिजिटल अरेस्ट” जैसे तरीके लोगों को घर बैठे कैद कर देते हैं।
लोगों के लिए चेतावनी
कानून प्रवर्तन एजेंसियां बार-बार स्पष्ट कर चुकी हैं कि कोई भी अधिकारी वीडियो कॉल के जरिए गिरफ्तारी नहीं करता और न ही जांच के नाम पर पैसे ट्रांसफर करने को कहता है। ऐसे मामलों में तुरंत सतर्क रहना और पुलिस से संपर्क करना जरूरी है।