हावड़ा (पश्चिम बंगाल): समय का पहिया घूमा और करीब 48 साल बाद इतिहास ने खुद को दोहराया। हावड़ा के प्रतिष्ठित महेश भट्टाचार्य होम्योपैथिक मेडिकल कॉलेज अस्पताल में मंगलवार शाम कुछ ऐसा हुआ, जिसने न सिर्फ एक मां और बच्चे की जान बचाई, बल्कि होम्योपैथिक चिकित्सा जगत में एक नया इतिहास रच दिया। साल 1978 के बाद यानी करीब 48 साल बाद इस कॉलेज के कैंपस में किसी बच्चे का जन्म हुआ है। डॉक्टरों, नर्सों और इंटर्न की तत्परता से ऑपरेशन थिएटर (OT) की लाल बत्ती एक बार फिर जल उठी।
रास्ते में बढ़ा दर्द, टोटो ही बन गया लेबर रूम
घटना मंगलवार शाम करीब 5:30 बजे की है। हावड़ा के डूमुरजला इलाके की रहने वाली 33 वर्षीय रिया गिरी को प्रसव पीड़ा (लेबर पेन) शुरू हुआ। उनके पति गोपाल गिरी, जो पेशे से एक टोटो (ई-रिक्शा) चालक हैं, अपनी पत्नी को हावड़ा जिला अस्पताल ले जा रहे थे, जहां उनका कार्ड बना हुआ था। लेकिन रास्ते में ही रिया का दर्द असहनीय हो गया। बच्चे का सिर बाहर आने लगा था (क्रॉनिंग की स्थिति)।स्थिति की गंभीरता को देखते हुए गोपाल तुरंत अपनी पत्नी को पास के महेश भट्टाचार्य होम्योपैथिक कॉलेज ले गए।
होम्योपैथिक डॉक्टरों ने बिना इंफ्रास्ट्रक्चर के दिखाया कमाल
उस समय अस्पताल में ड्यूटी पर डॉ. बिमान रॉय, इंटर्न डॉक्टर सरफराज हुसैन अंसारी और डॉ. मिजानुर रहमान तैनात थे। उन्होंने देखा कि समय बिल्कुल नहीं है। अगर तुरंत प्रसव नहीं कराया गया, तो मां और बच्चे दोनों की जान को खतरा हो सकता था।
डॉक्टरों ने बिना एक पल गंवाए, टोटो को ही कपड़ों से घेरकर अस्थाई लेबर रूम बनाया और टोटो के अंदर ही महिला की सुरक्षित 'नॉर्मल डिलीवरी' कराई। इसके बाद महिला को तुरंत इमरजेंसी वार्ड में ले जाया गया, जहां बिना किसी आधुनिक लेबर रूम सेटअप के डॉक्टरों ने प्लेसेंटा (गर्भनाल) को सुरक्षित बाहर निकाला। खबर मिलते ही गाइनोकोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. इंद्रजीत सामंत भी मौके पर पहुंच गए। डॉ. बिमान रॉय ने कहा- "अगर उस वक्त हम तुरंत प्रसव नहीं कराते, तो मां और बच्चे दोनों की जान को खतरा हो सकता था। इसलिए हमने कोई जोखिम न लेते हुए टोटो में ही डिलीवरी कराने का फैसला किया। मां और बच्चा दोनों पूरी तरह स्वस्थ हैं।"
ऑक्सीटोसिन नहीं थी, तो दी गई 'आर्निका'
आधुनिक चिकित्सा (एलोपैथी) के नियमों के अनुसार, प्रसव के बाद अत्यधिक रक्तस्राव को रोकने के लिए मां को ऑक्सीटोसिन (Oxytocin) इंजेक्शन दिया जाता है। चूंकि यह एक होम्योपैथिक अस्पताल था, इसलिए वहां यह इंजेक्शन उपलब्ध नहीं था। ऐसी स्थिति में डॉक्टरों ने अपनी पैथी पर भरोसा जताया और मां को होम्योपैथिक दवा 'आर्निका' (Arnica) दी, जो रक्तस्राव को नियंत्रित करने और हीलिंग में बेहद कारगर मानी जाती है। फिलहाल मां और 2 किलो 900 ग्राम के स्वस्थ बेटे को आगे की निगरानी के लिए हावड़ा जिला अस्पताल में शिफ्ट किया गया है।
1978 के बाद साल 2026 में लौटा 'इतिहास'
1965 में स्थापित हुए महेश भट्टाचार्य होम्योपैथिक कॉलेज का एक शानदार इतिहास रहा है। डीएन दे होम्योपैथिक कॉलेज के पूर्व प्रिसिंपल डॉ. अखिलेश खां बताते हैं कि 80 के दशक की शुरुआत तक होम्योपैथिक कॉलेजों के लेबर रूम में रोजाना 10 से 12 नॉर्मल डिलीवरी होती थीं। यह सिलसिला 1983 तक चला, लेकिन बाद में मॉडर्न मेडिसिन लॉबी के दबाव और सरकारी उदासीनता के कारण इन लेबर रूम्स को बंद कर दिया गया। इस कॉलेज में आखिरी डिलीवरी 1978 में हुई थी, जिसके बाद अब साल 2026 में यह सुखद इतिहास दोहराया गया है।
होम्योपैथिक समाज में जागी नई उम्मीद
इस ऐतिहासिक घटना पर कॉलेज के प्रिंसिपल प्रोफेसर डॉ. हिमांशु हाैत ने खुशी जताते हुए इसे एक मील का पत्थर बताया। उन्होंने कहा: "हमारे डॉक्टरों में प्रतिभा और दक्षता की कोई कमी नहीं है, बस बुनियादी ढांचे (Infrastructure) की कमी के कारण हम इसका उपयोग नहीं कर पा रहे थे। आज की इस घटना ने पूरे होम्योपैथिक समाज में एक नई उम्मीद जगाई है।"अब नियमानुसार, इस बच्चे का बर्थ सर्टिफिकेट भी महेश भट्टाचार्य अस्पताल से ही जारी किया जाएगा, जो गिरी परिवार के साथ-साथ इस कॉलेज के लिए भी हमेशा के लिए एक यादगार दस्तावेज बन गया है।