नई दिल्ली से एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में देश के सर्वोच्च न्यायालय ने चंबल क्षेत्र में हो रहे अवैध रेत खनन को लेकर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए इसे गंभीर पर्यावरणीय संकट करार दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस अनियंत्रित गतिविधि ने राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य में भारी तबाही मचा दी है और इससे घड़ियाल संरक्षण परियोजना पर सीधा खतरा उत्पन्न हो गया है।
अवैध खनन से बिगड़ता पारिस्थितिक संतुलन
न्यायालय ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि नदी तल में बड़े पैमाने पर हो रहे अवैध खनन ने पूरे क्षेत्र के पारिस्थितिक संतुलन को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। यह स्थिति केवल प्राकृतिक संसाधनों की हानि तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जलचर जीवों के अस्तित्व पर भी संकट गहरा गया है। विशेष रूप से घड़ियाल जैसे विलुप्तप्राय जीवों के लिए यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक मानी जा रही है।
तीन राज्यों की निष्क्रियता पर कड़ी टिप्पणी
न्यायालय ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सरकारों की इस मामले में विफलता पर तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि इन राज्यों ने अवैध खनन पर नियंत्रण करने में अपेक्षित तत्परता और प्रभावशीलता नहीं दिखाई है। न्यायालय ने यह भी कहा कि जिन परियोजनाओं को स्वयं राज्य सरकारों ने आगे बढ़ाया, उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उनकी जिम्मेदारी है, जिसमें वे असफल साबित हुए हैं।
निगरानी के लिए आधुनिक तकनीक के उपयोग का निर्देश
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए न्यायालय ने निर्देश दिया कि अवैध खनन के लिए उपयोग किए जाने वाले प्रमुख मार्गों पर उच्च गुणवत्ता वाले वाई-फाई सक्षम सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं। इन कैमरों की लाइव निगरानी संबंधित जिले के पुलिस अधीक्षक अथवा वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और वन विभाग के प्रभागीय अधिकारी के नियंत्रण में रहेगी। न्यायालय ने यह भी सुनिश्चित करने को कहा कि इन कैमरों की सतत निगरानी के लिए सक्षम अधिकारियों की नियुक्ति की जाए।
कड़ी कार्रवाई और अभियोजन के आदेश
न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि अवैध खनन में संलिप्त पाए जाने वाले वाहनों और मशीनों को तत्काल जब्त किया जाए और दोषियों के विरुद्ध विधिसम्मत कार्रवाई करते हुए अभियोजन चलाया जाए। यह आदेश इस बात का संकेत है कि न्यायपालिका इस मुद्दे पर किसी भी प्रकार की ढिलाई को स्वीकार करने के मूड में नहीं है।
घड़ियाल और अन्य जलचर जीवों पर मंडराता संकट
राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य लगभग 5400 वर्ग किलोमीटर में फैला एक त्रि-राज्यीय संरक्षित क्षेत्र है, जो घड़ियाल के अलावा कई अन्य दुर्लभ प्रजातियों का भी निवास स्थान है। इनमें लाल मुकुट वाली कछुआ प्रजाति और गंगा नदी डॉल्फिन जैसे संकटग्रस्त जीव शामिल हैं। अवैध खनन से इन सभी प्रजातियों के प्राकृतिक आवास को गंभीर क्षति पहुंच रही है, जिससे इनके अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया है।
अगली सुनवाई की तिथि निर्धारित
न्यायालय ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए सुनवाई की और इसे अत्यंत गंभीर मानते हुए अगली सुनवाई की तिथि 11 मई निर्धारित की है। इस बीच राज्यों को दिए गए निर्देशों के अनुपालन की अपेक्षा की गई है।