नई दिल्ली. भारत ने अपनी वायु शक्ति को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाते हुए भारतीय वायुसेना के लिए 114 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया है। फ्रांस की एयरोस्पेस कंपनी डसॉल्ट एविएशन ने लगभग 3.25 लाख करोड़ रुपये की प्रस्तावित परियोजना के लिए भारत सरकार को अपना तकनीकी और व्यावसायिक प्रस्ताव सौंप दिया है। यह प्रस्ताव भारत द्वारा मई में जारी किए गए 'लेटर ऑफ रिक्वेस्ट' के उत्तर में प्रस्तुत किया गया है।
प्रस्तावित समझौते में केवल विमानों की आपूर्ति ही नहीं, बल्कि बड़े स्तर पर भारत में उत्पादन और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण का भी प्रावधान शामिल है। रक्षा मंत्रालय की रक्षा अधिग्रहण परिषद पहले ही इस खरीद के लिए आवश्यकता की स्वीकृति प्रदान कर चुकी है। अब आगे की सभी औपचारिक प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद इस प्रस्ताव को अंतिम मंजूरी के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिमंडलीय सुरक्षा समिति के समक्ष रखा जाएगा। यह सौदा भारत की दीर्घकालिक रक्षा रणनीति के महत्वपूर्ण चरणों में से एक माना जा रहा है।
घटती स्क्वाड्रन क्षमता बनी सबसे बड़ी चुनौती
भारतीय वायुसेना लंबे समय से लड़ाकू स्क्वाड्रनों की संख्या में कमी की चुनौती का सामना कर रही है। वायुसेना की स्वीकृत स्क्वाड्रन क्षमता और वर्तमान उपलब्ध स्क्वाड्रनों के बीच का अंतर लगातार चिंता का विषय बना हुआ है। कई पुराने लड़ाकू विमान चरणबद्ध रूप से सेवा से बाहर हो रहे हैं, जबकि उनके स्थान पर नई पीढ़ी के स्वदेशी लड़ाकू विमानों का उत्पादन अभी पूरी तरह शुरू नहीं हो पाया है।
तेजस एमके-2 और उन्नत मध्यम लड़ाकू विमान जैसी स्वदेशी परियोजनाएं भविष्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनके पूर्ण परिचालन में आने में अभी समय लगेगा। ऐसे में प्रस्तावित 114 राफेल विमानों को केवल मौजूदा बेड़े का विस्तार नहीं, बल्कि वर्तमान आवश्यकताओं और भविष्य की स्वदेशी वायु शक्ति के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु के रूप में देखा जा रहा है। इससे आने वाले वर्षों में भारतीय वायुसेना की परिचालन क्षमता को स्थिर बनाए रखने में सहायता मिलने की संभावना है।
भारत में ही तैयार होंगे अधिकांश राफेल विमान
प्रस्तावित व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि अधिकांश लड़ाकू विमानों का निर्माण भारत में किया जाएगा। योजना के अनुसार प्रारंभिक 18 विमान सीधे तैयार अवस्था में भारत को उपलब्ध कराए जाएंगे, जबकि शेष 96 विमानों का संयोजन भारत में स्थापित उत्पादन व्यवस्था के माध्यम से किया जाएगा। इससे कुल विमानों का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा देश में ही तैयार होगा।
इस परियोजना के साथ स्वदेशीकरण पर भी विशेष बल दिया गया है। प्रारंभिक चरण में भारतीय हिस्सेदारी लगभग 30 प्रतिशत रहने का अनुमान है, जो उत्पादन प्रक्रिया आगे बढ़ने के साथ 60 प्रतिशत से अधिक तक पहुंच सकती है। इससे भारतीय रक्षा उद्योग, विमान निर्माण क्षेत्र तथा संबंधित लघु और मध्यम उद्योगों को भी नई तकनीकी क्षमताएं विकसित करने का अवसर मिलेगा। प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और स्थानीय विनिर्माण को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
राफेल की बहु-भूमिका क्षमता क्यों है महत्वपूर्ण
राफेल एक आधुनिक ट्विन इंजन बहुउद्देशीय लड़ाकू विमान है, जिसे विभिन्न प्रकार के सैन्य अभियानों के लिए विकसित किया गया है। यह वायु प्रभुत्व स्थापित करने, दुश्मन के विमानों को रोकने, भूमि पर सटीक हमले करने, समुद्री अभियानों में भाग लेने तथा टोही मिशनों को अंजाम देने जैसी अनेक भूमिकाएं एक ही उड़ान के दौरान निभाने में सक्षम माना जाता है।
भारत की सामरिक परिस्थितियों को देखते हुए इस प्रकार की बहु-भूमिका क्षमता विशेष महत्व रखती है। भारतीय वायुसेना को पश्चिमी सीमा, उत्तरी पर्वतीय क्षेत्रों और समुद्री क्षेत्र—तीनों मोर्चों पर समान रूप से तैयार रहना पड़ता है। ऐसी स्थिति में एक ऐसा विमान, जो परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न प्रकार के अभियानों में तुरंत उपयोग किया जा सके, रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत उपयोगी माना जाता है। इसी कारण राफेल को भारतीय वायुसेना की आधुनिक युद्ध क्षमता का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।
आधुनिक तकनीक से लैस है राफेल लड़ाकू विमान
राफेल विमान में अत्याधुनिक रडार और सेंसर प्रणाली उपलब्ध है, जो विभिन्न परिस्थितियों में लक्ष्य की पहचान और निगरानी की क्षमता को मजबूत बनाती है। इसके साथ उन्नत इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली भी लगी होती है, जो शत्रु के इलेक्ट्रॉनिक हमलों से स्वयं की सुरक्षा और मिशन की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
यह विमान नेटवर्क आधारित युद्ध प्रणाली के अनुरूप कार्य करने में सक्षम है, जिससे विभिन्न सैन्य प्लेटफॉर्म के बीच वास्तविक समय में सूचना का आदान-प्रदान संभव हो सकता है। इसके अतिरिक्त सटीक हथियारों के उपयोग, टोही अभियानों और भविष्य में आवश्यकतानुसार तकनीकी उन्नयन की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए भी इसका डिजाइन तैयार किया गया है। यही विशेषताएं इसे आधुनिक वायु युद्ध की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाती हैं।
मौजूदा बेड़े से आगे बढ़ने की आवश्यकता
भारतीय वायुसेना के पास वर्तमान में 36 राफेल लड़ाकू विमान सेवा में हैं। इन विमानों को अंबाला और हासीमारा स्थित दो प्रमुख स्क्वाड्रनों में तैनात किया गया है। इनकी तैनाती के बाद भारतीय वायुसेना की आधुनिक बहुउद्देशीय लड़ाकू क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और इन विमानों ने कई महत्वपूर्ण सैन्य अभ्यासों तथा परिचालन तैयारियों में अपनी उपयोगिता सिद्ध की है।
हालांकि, वर्तमान सामरिक आवश्यकताओं और दो प्रमुख मोर्चों पर संभावित चुनौतियों को देखते हुए 36 विमानों की संख्या पर्याप्त नहीं मानी जाती। इसी कारण 114 अतिरिक्त राफेल विमानों की खरीद को केवल विस्तार नहीं, बल्कि भारतीय वायुसेना की दीर्घकालिक परिचालन क्षमता को बनाए रखने की रणनीतिक आवश्यकता के रूप में देखा जा रहा है। इससे विभिन्न मोर्चों पर लड़ाकू स्क्वाड्रनों की उपलब्धता बढ़ेगी और भविष्य में स्वदेशी लड़ाकू विमान परियोजनाओं के पूर्ण रूप से तैयार होने तक वायुसेना की युद्ध क्षमता संतुलित बनी रह सकेगी।
आत्मनिर्भरता और सामरिक साझेदारी दोनों को मिलेगा बल
प्रस्तावित राफेल समझौता केवल रक्षा खरीद तक सीमित नहीं है। इसमें भारत में उत्पादन, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, स्थानीय उद्योगों की भागीदारी और दीर्घकालिक रखरखाव क्षमता विकसित करने जैसे अनेक पहलू शामिल हैं। इससे भारतीय रक्षा विनिर्माण क्षेत्र को नई तकनीकी विशेषज्ञता मिलने की संभावना है और रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को भी गति मिल सकती है।
साथ ही, भारत और फ्रांस के बीच रक्षा सहयोग भी इस परियोजना के माध्यम से और मजबूत होगा। दोनों देशों के बीच पिछले वर्षों में सामरिक साझेदारी लगातार गहरी हुई है और राफेल परियोजना उसी सहयोग का महत्वपूर्ण विस्तार मानी जा रही है। यदि प्रस्तावित प्रक्रिया नियत समय के अनुसार आगे बढ़ती है, तो आने वाले वर्षों में भारतीय वायुसेना की युद्ध क्षमता, तकनीकी दक्षता और स्वदेशी औद्योगिक आधार—तीनों को एक साथ मजबूती मिलने की संभावना है।