पश्चिम एशिया में कई महीनों तक बने तनाव के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से समुद्री यातायात सामान्य होने लगा है, जिसका सीधा लाभ भारत की कृषि व्यवस्था को मिलने जा रहा है। केंद्र सरकार के अनुसार यूरिया, डाई-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी), सल्फर तथा उर्वरक निर्माण के लिए आवश्यक अन्य कच्चे माल से लदे 15 जहाज सुरक्षित रूप से इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग को पार कर भारतीय बंदरगाहों की ओर बढ़ चुके हैं। इन जहाजों के पहुंचने से देश में उर्वरकों की उपलब्धता और वितरण व्यवस्था को मजबूती मिलेगी तथा खरीफ फसलों की बुआई के दौरान किसानों को आवश्यक खाद समय पर उपलब्ध कराई जा सकेगी। सरकार का कहना है कि इस घटनाक्रम से कृषि क्षेत्र में आपूर्ति संबंधी आशंकाओं पर काफी हद तक विराम लगेगा।
खरीफ की मांग को देखते हुए पहले से मजबूत किया गया भंडार
केंद्र सरकार ने खरीफ मौसम की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए पहले से ही व्यापक तैयारी की है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार लगभग 38.39 मिलियन टन अनुमानित मांग के मुकाबले अब तक लगभग 19.76 मिलियन टन उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित कर ली गई है, जो कुल अनुमानित आवश्यकता का आधे से अधिक हिस्सा है। यह स्थिति पिछले वर्ष की तुलना में कहीं अधिक संतोषजनक मानी जा रही है, क्योंकि इसी अवधि में उपलब्ध भंडार अपेक्षाकृत कम था। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि पर्याप्त अग्रिम भंडारण से बुआई के चरम समय में आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव कम रहेगा और किसानों को समय पर उर्वरक मिलने की संभावना अधिक मजबूत होगी।
वैश्विक संकट के बीच बहुस्तरीय रणनीति से बनी आपूर्ति की निरंतरता
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समुद्री व्यापार में आई बाधाओं के बावजूद भारत ने उर्वरकों की उपलब्धता बनाए रखने के लिए बहुस्तरीय रणनीति अपनाई। केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के अनुसार समय रहते आयात की योजना तैयार की गई, विभिन्न देशों से खरीद के स्रोतों का विस्तार किया गया तथा विदेशों में भारतीय मिशनों के साथ निरंतर समन्वय स्थापित किया गया। इस रणनीतिक दृष्टिकोण के कारण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव के बावजूद देश में उर्वरकों की उपलब्धता पूरी तरह बाधित नहीं हुई। विशेषज्ञों का मानना है कि आवश्यक कृषि संसाधनों के लिए आयात स्रोतों में विविधता लाना भविष्य की आपूर्ति सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण कदम है।
कई देशों से आयात ने घटाई एक मार्ग पर निर्भरता
सरकार ने उर्वरक आयात के लिए केवल एक क्षेत्र पर निर्भर रहने के बजाय विभिन्न देशों से आपूर्ति सुनिश्चित की। यूरिया की खरीद ओमान, मलेशिया, वियतनाम, नाइजीरिया, रूस, मिस्र और अल्जीरिया जैसे देशों से की गई, जबकि डाई-अमोनियम फॉस्फेट तथा एनपीके उर्वरकों की आपूर्ति रूस, मोरक्को, जॉर्डन, सऊदी अरब और अमेरिका सहित अनेक स्रोतों से वैकल्पिक समुद्री मार्गों के माध्यम से सुनिश्चित की गई। इस विविधीकृत आयात व्यवस्था ने वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बावजूद भारत की उर्वरक आपूर्ति को अपेक्षाकृत स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे भविष्य में किसी एक समुद्री मार्ग या क्षेत्र में व्यवधान आने की स्थिति में भी जोखिम कम करने में सहायता मिलेगी।
पश्चिम एशिया का तनाव बना था वैश्विक चिंता का कारण
फरवरी में पश्चिम एशिया में बढ़े भू-राजनीतिक तनाव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई थी। यह समुद्री मार्ग विश्व के सबसे व्यस्त व्यापारिक गलियारों में शामिल है, जहां से कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस, उर्वरक और अनेक आवश्यक वस्तुओं का बड़ा हिस्सा वैश्विक बाजारों तक पहुंचता है। समुद्री परिवहन में आई बाधाओं के कारण ऊर्जा और कृषि क्षेत्र दोनों में आपूर्ति को लेकर व्यापक चिंता उत्पन्न हुई थी। बाद में अमेरिका और ईरान के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर होने तथा क्षेत्रीय परिस्थितियों में सुधार के बाद जून के मध्य से समुद्री यातायात धीरे-धीरे सामान्य होने लगा, जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार को भी राहत मिली।
घरेलू उत्पादन भी पूरी क्षमता पर, किसानों के लिए भरोसे का संकेत
केंद्र सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि संकट के दौरान प्रभावित हुई प्राकृतिक गैस की आपूर्ति अब पूरी तरह बहाल हो चुकी है। इसके परिणामस्वरूप देश के सभी घरेलू यूरिया संयंत्र अपनी पूर्ण उत्पादन क्षमता के साथ कार्य कर रहे हैं। आयात और घरेलू उत्पादन दोनों मोर्चों पर मिली मजबूती से उर्वरकों की उपलब्धता और अधिक सुदृढ़ होने की उम्मीद है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वितरण व्यवस्था भी प्रभावी बनी रहती है तो खरीफ सीजन के दौरान किसानों को उर्वरकों की कमी का सामना नहीं करना पड़ेगा। यह स्थिति न केवल कृषि उत्पादन को स्थिर रखने में सहायक होगी, बल्कि देश की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी महत्वपूर्ण आधार प्रदान करेगी।