जोधपुर. विदाई ले रहे वायुसेना प्रमुख अमरप्रीत सिंह ने अपने अंतिम मीडिया संवाद में भारतीय वायुसेना की फाइटर फोर्स के स्तर में गिरावट पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वियों पर बढ़त बनाए रखने के लिए हर साल दो स्क्वाड्रन यानी 36 विमानों की शामिल करने की जरूरत है। प्रमुख ने संकेत दिया कि फाइटर स्क्वाड्रन की संख्या 30 तक गिर रही है जबकि चीफ ऑफ स्टाफ कमेटी यानी COSC ने 42 स्क्वाड्रन की मंजूरी दी थी। उनकी बात में दम है क्योंकि संख्या बल युद्ध क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। फिर भी आधुनिक युद्ध परिदृश्य में केवल विमानों की संख्या पर्याप्त नहीं मानी जा रही। लंबी दूरी के हथियारों की उपस्थिति ने पारंपरिक हवाई युद्ध की अवधारणा को बदल दिया है।
आधुनिक मिसाइलों के सामने फाइटर की सीमाएं
प्रश्न यह उठता है कि चीनी पीएल-17 जैसी 400 किलोमीटर रेंज वाली बियॉन्ड विजुअल रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल या एस-400 जैसे हवाई रक्षा सिस्टम के सामने मानव चालित भारतीय फाइटर कितना प्रभावी रह सकता है। एस-400 300 किलोमीटर से अधिक दूरी पर विमान को निशाना बना सकता है। यदि विमान एयर-टू-ग्राउंड या एयर-टू-एयर मिसाइल लॉन्च करने के लिए स्थिर होता है तो उसी क्षण उसे आसमान से मार गिराया जा सकता है। ऐसी स्थिति में केवल फाइटर स्क्वाड्रन बढ़ाने से सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होती। दुश्मन की लंबी दूरी की मारक क्षमता ने पारंपरिक हवाई श्रेष्ठता की धारणा को चुनौती दी है। भारत को इस नए समीकरण को गंभीरता से समझना होगा।
चीन मुख्य चुनौती पाकिस्तान नहीं
भारतीय सैन्य प्रतिष्ठान पाकिस्तान के मुकाबले अपनी स्थिति को संतोषजनक मान सकता है लेकिन वास्तविक चुनौती चीन है। चीन ने कमांड के थिएटराइजेशन को हासिल कर लिया है जिससे उसकी प्रतिक्रिया क्षमता कहीं अधिक तेज हो गई है और उसके पास क्रियाशील खुफिया जानकारी भी बेहतर है। आधुनिक युद्ध में केवल संख्या बल पर्याप्त नहीं बल्कि त्वरित प्रतिक्रिया और सटीक निशाना लगाने की क्षमता निर्णायक साबित होती है। चीन की इन तैयारियों को देखते हुए भारत को अपनी रणनीति में आमूलचूल बदलाव की जरूरत है। पारंपरिक फाइटर आधारित सोच से आगे बढ़कर स्टैंड-ऑफ क्षमताओं पर ध्यान देना अब अपरिहार्य हो गया है।
ईरान और हूती उदाहरणों से सबक
ईरान के पास उल्लेखनीय वायुसेना नहीं है फिर भी उसने सात महीने के युद्ध में अमेरिका-इजरायल गठजोड़ का मुकाबला किया और मानवरहित कॉम्बैट एयर सिस्टम क्रूज मिसाइल कामीकेज ड्रोन तथा बैलिस्टिक मिसाइलों से पश्चिम एशिया में आर्थिक-राजनीतिक उथल-पुथल मचाई। ईरानी प्रॉक्सी हूती के पास भी कोई प्रभावी वायुसेना नहीं है लेकिन उन्होंने सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन को भारी नुकसान पहुंचाया। दम्माम रियाद और साम्राज्य की पूर्व-पश्चिम पाइपलाइन पर बैलिस्टिक मिसाइल हमले किए। सऊदी अरब के पास अमेरिकी एफ-15 टॉरनेडो और टाइफून फाइटर होने के बावजूद हूती को निष्क्रिय नहीं कर पाया। इन उदाहरणों से साफ है कि स्टैंड-ऑफ हथियार पारंपरिक वायुसेना से अधिक प्रभावी हो सकते हैं।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद बदली सरकारी प्राथमिकताएं
नरेन्द्र मोदी सरकार ने पिछले मई में हुए ऑपरेशन सिंदूर के बाद महसूस किया है कि भारत को उचित एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल डिफेंस लंबी दूरी की एयर-टू-एयर मिसाइल लंबी दूरी के लॉयटरिंग एम्युनिशन हाइपरसोनिक बैलिस्टिक मिसाइल और लंबी दूरी के कामीकेज ड्रोन की जरूरत है। यूक्रेन के पास बहुत कम फाइटर फोर्स होने के बावजूद उसने ड्रोन क्षमता बढ़ाकर रूसी ऊर्जा अवसंरचना पर इतने हमले किए कि पूर्व महाशक्ति के कई तेल रिफाइनरी ठप हो गए। इन सबक को ध्यान में रखते हुए भारत अब लंबी दूरी के हथियारों पर जोर दे रहा है। पारंपरिक फाइटर आधारित रणनीति से हटकर स्टैंड-ऑफ क्षमताओं को प्राथमिकता दी जा रही है।
भारत की मिसाइल और ड्रोन योजनाएं
लंबी दूरी के हथियारों की जरूरत को ध्यान में रखते हुए भारत रूसी आरवीवी-बीडी एयर-टू-एयर मिसाइल हासिल करने की योजना बना रहा है जिसकी रेंज लगभग 300 किलोमीटर है और इसे सु-30 एमकेआई फाइटर के साथ एकीकृत किया जाएगा। देश स्वदेशी अस्त्र मार्क-2 मिसाइल विकसित कर रहा है जिसकी रेंज करीब 200 किलोमीटर होगी और इसका परीक्षण इस वर्ष प्रस्तावित है। अस्त्र मार्क-3 की रेंज 300 किलोमीटर से अधिक होगी। इसके अलावा भारत 2028-29 में अमेरिका से 31 प्रीडेटर हाई-एल्टीट्यूड लॉन्ग-रेंज ड्रोन हासिल करेगा जो एयर-टू-एयर मिसाइल और जमीनी लक्ष्य पर भारी आयुध दागने में सक्षम होंगे। ये कदम भारत की वायु शक्ति को नई दिशा देने वाले हैं।