अर्थशास्त्र जैसे प्राचीन ग्रंथ में हाथियों को अत्यंत मूल्यवान संपत्ति माना गया था। राजा गठबंधन बनाने के लिए उन्हें उपहार में देते थे और सेनापति किले के फाटक तोड़ने के लिए उनका सहारा लेते थे। आज भी गणेश जी बाधाओं को दूर करने वाले देवता के रूप में पूजे जाते हैं और बच्चे ए फॉर एलीफेंट सीखते हैं। फिर भी इस सम्मान का असर संरक्षण पर नहीं पड़ा है। हाथियों के प्रति श्रद्धा होने के बावजूद उनके आवास लगातार सिकुड़ रहे हैं। आधुनिक विकास की होड़ ने प्राचीन सम्मान को व्यावहारिक सुरक्षा में नहीं बदला। यह विडंबना भारतीय वन्यजीव संरक्षण की सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।
हाथियों की घटती संख्या और चौंकाने वाले आंकड़े
वन्यजीव संस्थान ऑफ इंडिया द्वारा पिछले वर्ष प्रकाशित सर्वेक्षण में देश में हाथियों की संख्या 22446 बताई गई है जो 2017 की तुलना में 18 प्रतिशत कम है। रिपोर्ट के प्रमुख लेखक कमर कुरैशी का कहना है कि कुछ राज्यों में गिरावट चौंकाने वाली है। घनी आबादी वाले भारत में गांव जंगलों के बीच बिखरे हुए हैं जिसकी वजह से हाथी जंगल के टुकड़ों के बीच संकरी गलियारों तक सीमित हो गए हैं। वन्यजीव ट्रस्ट ऑफ इंडिया के विवेक मेनन के अनुसार 2010 में उनकी टीम ने 88 ऐसे मार्ग पहचाने थे। आज यह संख्या बढ़कर लगभग 150 हो गई है जो आवास के सिकुड़ने का स्पष्ट संकेत है।
बुनियादी ढांचे और खनन से बढ़ता दबाव
जंगलों को चीरती सड़कें रेलवे लाइनें और अन्य बुनियादी ढांचा परियोजनाएं हाथियों के पारंपरिक मार्गों को काट रही हैं। खनन और विस्फोट वाले स्थल भी उनके रास्ते में बाधा बनते हैं। परिणामस्वरूप हाथी खेतों में घुसने को मजबूर हो जाते हैं जिससे मानव-हाथी संघर्ष बढ़ रहा है। पश्चिम बंगाल में हुल्ला पार्टियां भीड़ के रूप में आग के गोले और पटाखे फेंककर हाथियों को भगाती हैं जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर प्रतिबंध लगाया हुआ है। बिजली की बाड़ें भी उनके मार्ग को रोकती हैं। ये सभी कारक हाथियों को उनके प्राकृतिक आवास से बेदखल कर रहे हैं और संघर्ष की घटनाओं को बढ़ावा दे रहे हैं।
हाथियों की भौतिक समझ और बचाव की चुनौतियां
पारिस्थितिकीविद् रमन सुकुमार का कहना है कि हाथी उत्कृष्ट भौतिक विज्ञानी होते हैं। वे अपने दांतों का इस्तेमाल करते हैं जो बिजली के खराब चालक होते हैं और बाड़ों को तोड़ देते हैं या लकड़ियां फेंककर शॉर्ट सर्किट करा देते हैं। वन रक्षक और कर्मचारी जो हाथियों को सुरक्षित स्थानों पर वापस ले जाने का प्रयास करते हैं पूरी तरह अपर्याप्त उपकरणों और तैयारी के अभाव से जूझ रहे हैं। संरक्षणवादी प्रेरणा बिंद्रा के अनुसार अधिकांश के पास टॉर्च जैसी बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं। इस अपर्याप्तता के कारण हाथियों की सुरक्षा और मानव जीवन दोनों खतरे में पड़ जाते हैं। जमीनी स्तर पर संरक्षण व्यवस्था की कमजोरी साफ दिखाई दे रही है।
सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की अनदेखी
सर्वोच्च न्यायालय ने कई बार हाथियों के संरक्षण और उनके मार्गों को सुरक्षित रखने के निर्देश दिए हैं लेकिन जमीनी स्तर पर इनका पालन नहीं हो रहा। पश्चिम बंगाल में हुल्ला पार्टियों पर प्रतिबंध के बावजूद ऐसी घटनाएं जारी हैं। बिजली की बाड़ें और अन्य अवैध बाधाएं लगाई जा रही हैं जो हाथियों के आवागमन को रोकती हैं। अदालती आदेशों की अनदेखी से संरक्षण प्रयासों की विश्वसनीयता प्रभावित हो रही है। यदि कानून का सख्ती से पालन नहीं किया गया तो हाथियों की संख्या में और गिरावट तय है। प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी इस संकट को और गहरा रही है।
संरक्षण की दिशा में जरूरी कदम
हाथियों के सिकुड़ते आवास और बढ़ते संघर्ष को देखते हुए तत्काल ठोस कदम उठाने की जरूरत है। गलियारों को सुरक्षित बनाना अवैध बाधाओं को हटाना और वन कर्मियों को पर्याप्त उपकरण उपलब्ध कराना प्राथमिकता होनी चाहिए। स्थानीय समुदायों को संरक्षण में शामिल करना और वैकल्पिक आजीविका के विकल्प देना भी आवश्यक है। वैज्ञानिक अध्ययन और निरंतर निगरानी से सही रणनीति बनाई जा सकती है। यदि समय रहते प्रभावी उपाय नहीं किए गए तो भारतीय हाथियों का भविष्य और अधिक संकटपूर्ण हो जाएगा। संरक्षण केवल अदालती आदेशों से नहीं बल्कि जमीनी क्रियान्वयन से ही संभव है।