गुजरात की राजधानी गांधीनगर में स्थित कोबा तीर्थ में जैन परंपरा को समर्पित भव्य संग्रहालय का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री ने भारत की प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण को लेकर महत्वपूर्ण विचार रखे। यह संग्रहालय जैन धर्म के विकास और उसकी आध्यात्मिक यात्रा को दर्शाने वाले दो हजार से अधिक दुर्लभ अवशेषों को संजोए हुए है, जो भारतीय सभ्यता की गहराई और वैभव का सजीव प्रमाण प्रस्तुत करते हैं।
पांडुलिपियों की उपेक्षा पर तीखी टिप्पणी
प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में स्वतंत्रता के बाद की सरकारों पर यह कहते हुए प्रश्न उठाया कि देश की प्राचीन पांडुलिपियों के संरक्षण को वह महत्व नहीं दिया गया, जिसकी अपेक्षा थी। उन्होंने कहा कि औपनिवेशिक मानसिकता के प्रभाव के कारण इस अमूल्य ज्ञान परंपरा की उपेक्षा की गई, जबकि यह कार्य राष्ट्रीय जिम्मेदारी के रूप में किया जाना चाहिए था। उनके अनुसार अब इस दृष्टिकोण में परिवर्तन लाया गया है और विरासत संरक्षण को नई प्राथमिकता दी जा रही है।
राजनीतिक दृष्टिकोण से ऊपर उठने की आवश्यकता
प्रधानमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि अतीत में सांस्कृतिक कार्यों को अक्सर राजनीतिक दृष्टिकोण से देखा जाता था, जिससे वास्तविक उद्देश्य प्रभावित होता था। उन्होंने कहा कि अब इस प्रवृत्ति को समाप्त कर दिया गया है और देश की सांस्कृतिक धरोहर को निष्पक्ष और व्यापक दृष्टिकोण से संरक्षित किया जा रहा है। यह परिवर्तन भारत की सांस्कृतिक पहचान को पुनर्स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
ज्ञान संरक्षण में संतों का योगदान
इस अवसर पर उन्होंने उन संतों के योगदान को भी स्मरण किया, जिन्होंने जीवनभर देशभर में भ्रमण कर प्राचीन पांडुलिपियों को खोजने और सुरक्षित रखने का कार्य किया। उन्होंने बताया कि लाखों पांडुलिपियां, जो ताड़पत्र और भोजपत्र पर लिखी गई थीं, आज सुरक्षित रूप में संरक्षित हैं। यह प्रयास न केवल अतीत की विरासत को बचाने का कार्य है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान के स्रोत को सुरक्षित रखने की दिशा में भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
सम्राट सम्प्रति के आदर्शों की प्रासंगिकता
संग्रहालय सम्राट सम्प्रति महाराज को समर्पित है, जिन्होंने अपने शासनकाल में अहिंसा और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा दिया। प्रधानमंत्री ने उनके शासन की तुलना वर्तमान समय से करते हुए कहा कि जहां कई शासकों ने हिंसा को सत्ता का साधन बनाया, वहीं सम्राट सम्प्रति ने अहिंसा के माध्यम से समाज को दिशा दी। यह आदर्श आज भी उतना ही प्रासंगिक है, विशेषकर ऐसे समय में जब विश्व अशांति और संघर्ष की स्थिति से गुजर रहा है।
वैश्विक संदर्भ में अहिंसा का संदेश
प्रधानमंत्री ने कहा कि यह संग्रहालय केवल भारत के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश देता है। वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में, जब अनेक क्षेत्रों में अस्थिरता और संघर्ष की स्थिति बनी हुई है, तब अहिंसा, सहअस्तित्व और शांति का यह संदेश अत्यंत आवश्यक हो जाता है। यह संग्रहालय न केवल अतीत की स्मृति है, बल्कि भविष्य के लिए मार्गदर्शन भी प्रदान करता है।