भारतीय रिज़र्व बैंक RBI ने खेती को आधुनिक, सुरक्षित और तकनीक-सक्षम बनाने की दिशा में किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) में बड़े बदलावों की रूपरेखा पेश की है। फरवरी 2026 की मौद्रिक नीति के बाद आए नए मास्टर डायरेक्शन के जरिए यह फैसला लिया गया है कि किसानों की कर्ज उपलब्धता, चुकाने की क्षमता और प्रक्रियात्मक परेशानियों को न्यूनतम कर उन्हें अधिक स्वायत्त और सक्षम बनाया जाए।
KCC की वैधता अब 6 साल, बार-बार रिन्यूअल नहीं
पहले किसान क्रेडिट कार्ड हर 5 साल में नवीनीकरण के लिए अनिवार्य होता था। नई व्यवस्था के तहत उसकी वैधता को बढ़ाकर 6 साल किया जा रहा है। यह परिवर्तन किसानों को बार-बार दस्तावेज, सत्यापन और बैंक चक्कर से राहत देगा। इससे बैंक संबंधों में विश्वास और स्थिरता बढ़ेगी तथा किसान लंबे समय तक निर्बाध रूप से क्रेडिट सुविधा का लाभ उठा सकेंगे।
फसल चक्र के अनुरूप कर्ज चुकाने की सुविधा
किसानों की सबसे बड़ी चुनौती यह रहती है कि फसल बिकने में देरी होने पर भुगतान समय पर नहीं हो पाता। इसी समस्या को समझते हुए आरबीआई ने कर्ज अदायगी को फसल की प्रकृति से जोड़ने का फैसला किया है। छोटी अवधि वाली फसलों के लिए 12 महीने की मियाद तय की गई है, जबकि लंबी अवधि वाली फसलों के लिए यह सीमा 18 महीने निर्धारित की गई है। इसका लाभ यह होगा कि किसान अपनी फसल को बेहतर दाम मिलने पर ही बेचकर कर्ज चुका पाएगा, जिससे आर्थिक दबाव समाप्त होगा।
लोन प्रक्रिया होगी डिजिटल और आसान
नई दिशानिर्देशों के तहत KCC अब तकनीक से गहराई से जुड़ जाएगा। किसानों को लोन आवेदन, दस्तावेज सत्यापन और मंजूरी की प्रक्रिया में न्यूनतम कागजी कार्रवाई करनी होगी। डिजिटल फार्मिंग डेटा, भूमि रिकॉर्ड, आधार वेरिफिकेशन और बैंकिंग सिस्टम के इंटीग्रेशन से कर्ज स्वीकृति तेज और पारदर्शी होगी। इससे बैंक भी जोखिम प्रबंधन बेहतर कर सकेंगे।
कर्ज सीमा में बढ़ोतरी की तैयारी
आरबीआई उन प्रावधानों पर भी काम कर रहा है जिनके तहत किसानों की कर्ज सीमा को उनकी वास्तविक उपज, लागत, बाजार मूल्य और मौसम आधारित जोखिमों के अनुसार अपडेट किया जाएगा। इससे KCC किसानों के लिए अधिक प्रभावी वित्तीय उपकरण बनेगा और कठिन परिस्थितियों में भी उनकी आर्थिक मजबूती बनी रहेगी।
किसानों पर प्रत्यक्ष प्रभाव और भविष्य की संभावनाएँ
KCC के इन बड़े बदलावों से किसानों का बोझ कम होगा, चुकौती क्षमता बढ़ेगी और क्रेडिट का प्रवाह सुचारू होगा। यह कदम खेती को हाईटेक, कुशल और आर्थिक रूप से सुरक्षित बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है। कृषि अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए यह सुधार बेहद सकारात्मक संकेत देता है।
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