नई दिल्ली. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व शुक्रवार, 4 सितंबर को देशभर में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। दिनभर उपवास, पूजा, भजन और विशेष श्रृंगार के बाद जैसे ही मध्यरात्रि का क्षण आया, मंदिरों में शंखनाद, घंटियों और जयकारों के बीच भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव की धूम मच गई। श्रद्धालुओं ने बाल गोपाल के जन्म की खुशी में आरती उतारी और विभिन्न मंदिरों में परंपरागत विधि से जन्माभिषेक किया। ब्रज से लेकर राजस्थान तक मंदिरों और आसपास के क्षेत्रों में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे और देर रात तक धार्मिक आयोजन चलते रहे। जन्माष्टमी का यह उत्सव केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अलग-अलग क्षेत्रों की स्थानीय परंपराओं और सांस्कृतिक रंगों ने इसे विशेष बना दिया।
भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का समय आधी रात माना जाता है और इसी कारण जन्माष्टमी के प्रमुख अनुष्ठानों का केंद्र मध्यरात्रि बनी रही। कई मंदिरों में जन्म के बाद पंचामृत अभिषेक, विशेष आरती और भोग अर्पित किया गया। भक्तों ने अपने आराध्य के बाल स्वरूप को झूला झुलाया और माखन-मिश्री सहित विभिन्न प्रसाद अर्पित किए। मंदिर परिसरों में भक्ति संगीत और धार्मिक उद्घोषों के बीच वातावरण देर रात तक भक्तिमय बना रहा। इस बार भी देश के अलग-अलग हिस्सों में जन्माष्टमी की परंपराओं में स्थानीय विशेषताओं की झलक दिखाई दी, जिससे एक ही पर्व अनेक रंगों में सामने आया।
श्रीनाथजी मंदिर में 21 तोपों की सलामी ने रचा अनोखा दृश्य
राजस्थान के नाथद्वारा स्थित श्रीनाथजी मंदिर में जन्माष्टमी का उत्सव अपनी ऐतिहासिक परंपरा के कारण विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। मध्यरात्रि में भगवान श्रीनाथजी के जन्मोत्सव के अवसर पर 21 तोपों की सलामी दी गई। यह परंपरा पिछले कई दशकों से नहीं, बल्कि लगभग 353 वर्षों से चली आ रही बताई जाती है और इसे मेवाड़ की राजपरंपरा से जोड़कर देखा जाता है। जन्म के समय तोपों की गर्जना के साथ श्रद्धालुओं ने जयकारे लगाए और पूरा वातावरण उत्सवमय हो उठा। मंदिर प्रशासन की ओर से इस परंपरा के निर्वहन से पहले संबंधित तोपों की जांच भी की गई, ताकि धार्मिक आयोजन को निर्धारित रीति के अनुसार सुरक्षित ढंग से पूरा किया जा सके।
श्रीनाथजी मंदिर में तोपों की सलामी सामान्य आतिशबाजी से अलग धार्मिक और ऐतिहासिक परंपरा का हिस्सा मानी जाती है। मंदिर से जुड़ी व्यवस्था में दो पारंपरिक तोपों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें नर और मादा तोप के नाम से जाना जाता है। जन्माष्टमी की मध्यरात्रि में इनसे सलामी देकर भगवान के जन्म की घोषणा की जाती है। इस दृश्य को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु नाथद्वारा पहुंचे थे। मंदिर और आसपास के क्षेत्रों में भीड़ को देखते हुए दर्शन व्यवस्था और प्रवेश-निकास के लिए विशेष प्रबंध किए गए थे। इस तरह यहां आधुनिक आयोजन से ज्यादा सदियों पुरानी परंपरा ने जन्माष्टमी के उत्सव को अपनी विशिष्ट पहचान दी।
सांवलियाजी में 1100 ड्रोनों ने आसमान में रची कृष्ण लीला
चित्तौड़गढ़ के प्रसिद्ध सांवलियाजी मंदिर में इस बार जन्माष्टमी का सबसे आकर्षक दृश्य आसमान में दिखाई दिया। करीब 3 वर्षों के अंतराल के बाद मंदिर परिसर में 1100 ड्रोनों का विशेष प्रकाश प्रदर्शन आयोजित किया गया। रात करीब 8 बजे शुरू हुए इस प्रदर्शन में एक साथ उड़ाए गए ड्रोनों ने आकाश में अलग-अलग आकृतियां बनाकर भगवान श्रीकृष्ण के जीवन और उनकी लीलाओं को प्रस्तुत किया। भगवान के जन्म से लेकर बाल स्वरूप, बांसुरी वादन और गोवर्धन धारण जैसे प्रसंगों को प्रकाश आकृतियों के माध्यम से दिखाया गया। मंदिर और सांवलिया सेठ से जुड़ी आकृतियां भी आसमान में उभरीं, जिन्हें देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु देर शाम तक वहां मौजूद रहे।
इस प्रकाश प्रदर्शन की खासियत यह रही कि धार्मिक कथा को आधुनिक तकनीकी माध्यम के जरिए लोगों के सामने प्रस्तुत किया गया। ड्रोनों की सामूहिक गति और प्रकाश संयोजन से बने दृश्यों ने पारंपरिक कथा को एक नए दृश्यात्मक रूप में सामने रखा। श्रद्धालुओं के लिए यह केवल मनोरंजन का आयोजन नहीं था, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं को देखने का एक अलग अनुभव भी रहा। आयोजन में पारंपरिक धार्मिक कार्यक्रमों के साथ तकनीकी प्रस्तुति को जोड़ा गया, जिससे सांवलियाजी का जन्माष्टमी उत्सव विशेष रूप से चर्चा में रहा। तीन वर्ष बाद लौटे इस आयोजन ने मंदिर परिसर और आसपास के क्षेत्र में उत्सव की भव्यता को और बढ़ा दिया।
जयपुर में 425 लीटर दूध और 365 किलो दही से अभिषेक
राजस्थान की राजधानी जयपुर स्थित श्री गोविंददेवजी मंदिर में भी जन्माष्टमी का आयोजन बड़े धार्मिक वैभव के साथ हुआ। यहां ठाकुरजी के पंचामृत अभिषेक के लिए 425 लीटर दूध, 365 किलो दही, 11 किलो घी, 85 किलो बूरा और 11 किलो शहद की व्यवस्था की गई। मध्यरात्रि में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच विशेष पूजा और अभिषेक की परंपरा निभाई गई। इस दौरान मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे और भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के साक्षी बने। अभिषेक के बाद ठाकुरजी को पंजीरी, लड्डू, खिरसा और रबड़ी सहित विभिन्न प्रसाद अर्पित किए गए।
गोविंददेवजी मंदिर में जन्माष्टमी की तैयारियां कई स्तरों पर की गई थीं। विशेष दर्शन, वैदिक अनुष्ठान, ठाकुरजी का श्रृंगार और जन्म के समय होने वाली परंपरागत हवाई तोपों की गर्जना ने आयोजन को भव्य रूप दिया। मंदिर प्रशासन ने श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या को देखते हुए दर्शन और भीड़ प्रबंधन की व्यवस्थाएं भी की थीं। जन्म के समय 31 तोपों की हवाई गर्जना और आतिशबाजी के बीच मंदिर परिसर में उत्साह चरम पर पहुंच गया। इस आयोजन ने यह भी दिखाया कि राजस्थान के प्रमुख कृष्ण मंदिरों में जन्माष्टमी केवल पूजा का पर्व नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही धार्मिक परंपराओं और सामुदायिक सहभागिता का बड़ा उत्सव है।
बांके बिहारी के लिए तैयार हुआ 31 किलो का विशेष केक
वृंदावन के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर में इस बार कान्हा के जन्मोत्सव को एक अलग अंदाज में मनाया गया। भगवान के लिए आगरा में 31 किलो का तीन मंजिला विशेष केक तैयार किया गया। इसे लगभग 20 कारीगरों की टीम ने करीब 12 घंटे की मेहनत से तैयार किया। केक को पाग, सूखे मेवे, चॉकलेट और जैली जैसी सामग्री से सजाया गया था तथा इसकी बनावट को मंदिर और जन्माष्टमी की थीम के अनुरूप विशेष रूप दिया गया। केक की ऊपरी मंजिल पर ठाकुरजी का स्वरूप दर्शाया गया, जबकि नीचे के हिस्से में सजावटी संरचनाओं के जरिए इसे आकर्षक बनाया गया। इस विशेष तैयारी के साथ 56 भोग की भी व्यवस्था की गई थी।
बांके बिहारी मंदिर में जन्माष्टमी का धार्मिक महत्व अपने आप में अत्यंत विशेष है और मध्यरात्रि में ठाकुरजी का जन्माभिषेक प्रमुख आकर्षण रहा। जन्म के अवसर पर दूध, दही, घी, शहद, शक्कर, यमुनाजल, सुगंधित जल और अन्य परंपरागत द्रव्यों से अभिषेक किया गया। मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ रही और श्रद्धालु अपने आराध्य के जन्मोत्सव की झलक पाने के लिए घंटों प्रतीक्षा करते नजर आए। विशेष केक और भोग की तैयारी ने इस वर्ष के आयोजन को एक अतिरिक्त आकर्षण दिया, लेकिन इसकी मूल भावना वही रही जिसमें भक्त बाल स्वरूप भगवान के जन्म की खुशी को सामूहिक उत्सव के रूप में मनाते हैं।
परंपरा और तकनीक का अनोखा संगम बना आकर्षण
इस बार राजस्थान और ब्रज क्षेत्र के प्रमुख मंदिरों में हुए आयोजनों को देखें तो जन्माष्टमी ने धार्मिक परंपरा और आधुनिक प्रस्तुति के बीच एक दिलचस्प संतुलन दिखाया। नाथद्वारा में सदियों पुरानी 21 तोपों की सलामी ने ऐतिहासिक परंपरा को जीवित रखा, जयपुर में विशाल मात्रा में पंचामृत से अभिषेक ने धार्मिक अनुष्ठान की भव्यता दिखाई और वृंदावन में 31 किलो के विशेष केक ने उत्सव के नए रूप को सामने रखा। वहीं सांवलियाजी में 1100 ड्रोनों के प्रकाश प्रदर्शन ने आधुनिक तकनीक के माध्यम से कृष्ण की लीलाओं को आकाश में जीवंत कर दिया। अलग-अलग रूपों के बावजूद इन सभी आयोजनों का केंद्र भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव और उससे जुड़ी सामूहिक आस्था ही रही।
ऐसे आयोजनों में बदलते समय के साथ धार्मिक उत्सवों की प्रस्तुति में आए बदलाव को भी देखा जा सकता है। पारंपरिक पूजा-पद्धति, वैदिक मंत्रोच्चार, अभिषेक, भोग और आरती जहां आस्था की मूल धारा को बनाए रखते हैं, वहीं प्रकाश प्रदर्शन और भव्य सज्जा नई पीढ़ी को इन आयोजनों से जोड़ने का माध्यम बन रहे हैं। हालांकि धार्मिक परंपराओं की मूल भावना और मर्यादा बनाए रखना उतना ही महत्वपूर्ण है। इस दृष्टि से इस वर्ष के जन्माष्टमी समारोहों ने यह संदेश दिया कि परंपरा और आधुनिकता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि उचित संतुलन के साथ किसी सांस्कृतिक उत्सव को और व्यापक तथा प्रभावशाली बना सकते हैं।
देशभर में दिखी कृष्ण भक्ति की एक जैसी तस्वीर
राजस्थान और ब्रज के इन विशेष आयोजनों के अलावा देश के अनेक हिस्सों में भी जन्माष्टमी पर मंदिरों में विशेष पूजा और जन्माभिषेक किए गए। आधी रात के समय भक्तों ने भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की प्रतीकात्मक घोषणा के साथ आरती और जयघोष किया। कहीं झांकियां सजाई गईं तो कहीं विशेष भोग और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन हुआ। पटना सहित कई शहरों में भी मध्यरात्रि में भगवान के प्राकट्य के बाद विशेष अभिषेक और पूजा की गई। इससे स्पष्ट रहा कि जन्माष्टमी का उत्सव क्षेत्र बदलने के साथ अपनी शैली जरूर बदलता है, लेकिन भगवान कृष्ण के प्रति श्रद्धा और उल्लास की भावना पूरे देश में समान रूप से दिखाई देती है।
इस वर्ष के जन्माष्टमी समारोहों की सबसे बड़ी विशेषता यही रही कि एक ही पर्व ने आस्था के अनेक रंग सामने रखे। कहीं सदियों पुरानी राजपरंपरा के प्रतीक के रूप में तोपों की सलामी हुई, कहीं विशाल मात्रा में पंचामृत से अभिषेक हुआ, कहीं 31 किलो के विशेष केक से जन्मदिन का उत्सव मनाया गया और कहीं 1100 ड्रोनों ने रात के आकाश को कृष्ण की लीलाओं से भर दिया। इन आयोजनों ने धार्मिक उत्सव की भव्यता के साथ भारत की विविध सांस्कृतिक परंपराओं की झलक भी दिखाई। कान्हा के जन्म का उल्लास इस बार भी मंदिरों से निकलकर शहरों और कस्बों तक पहुंचा और ‘नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की’ के जयघोष से वातावरण गूंजता रहा।