नई दिल्ली. लोकसभा के भीतर परिसीमन को लेकर चल रही तीखी बहस के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सरकार का पक्ष स्पष्ट करते हुए कहा कि प्रस्तावित बदलावों से किसी भी राज्य के प्रतिनिधित्व में कमी नहीं आएगी। उन्होंने यह भी कहा कि यह प्रक्रिया व्यावहारिक दृष्टिकोण पर आधारित है और इसका उद्देश्य जनसंख्या के अनुरूप प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है।
परिसीमन को लेकर उठी आशंकाए
पिछले कुछ समय से दक्षिणी राज्यों में यह चिंता व्यक्त की जा रही है कि परिसीमन के बाद उत्तरी राज्यों को अधिक लाभ मिलेगा, जबकि दक्षिणी राज्य पीछे छूट सकते हैं। इसका मुख्य कारण जनसंख्या वृद्धि में असमानता को बताया जा रहा है, जहां उत्तरी राज्यों में जनसंख्या वृद्धि अधिक रही है। इस पर विपक्ष ने भी सरकार को घेरते हुए संतुलन बनाए रखने की मांग की है।
गृह मंत्री का व्यावहारिक दृष्टिकोण
लोकसभा में अपने वक्तव्य के दौरान गृह मंत्री ने स्पष्ट किया कि परिसीमन के बाद सीटों की संख्या मौजूदा अनुपात के अनुसार ही बढ़ाई जाएगी। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि कर्नाटक में वर्तमान में 28 सीटें हैं, जो कुल 543 सीटों का लगभग 5.15 प्रतिशत प्रतिनिधित्व करती हैं। प्रस्ताव लागू होने के बाद यह संख्या बढ़कर 42 हो जाएगी, लेकिन प्रतिशत लगभग समान रहेगा, जिससे किसी प्रकार का नुकसान नहीं होगा।
सीटों में व्यापक वृद्धि का प्रस्ताव
सरकार द्वारा प्रस्तुत प्रस्तावों के अनुसार लोकसभा की कुल सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने की योजना है। यह वृद्धि देश की बढ़ती जनसंख्या और बेहतर प्रतिनिधित्व की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए की जा रही है। इस कदम को लोकतांत्रिक ढांचे को अधिक समावेशी बनाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
महिला आरक्षण को मिलेगा नया आयाम
इस परिसीमन प्रक्रिया के साथ ही संसद में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण लागू करने की योजना भी जुड़ी हुई है। यह प्रस्ताव वर्ष 2023 में स्वीकृत किया गया था, जिसे अब परिसीमन के माध्यम से लागू किया जाएगा। इससे संसद में महिलाओं की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि होने की उम्मीद है।
जनगणना आधारित होगा परिसीमन
सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि परिसीमन की पूरी प्रक्रिया वर्ष 2011 की जनगणना के आधार पर की जाएगी। इससे राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया जाएगा। हालांकि, इस आधार को लेकर भी कुछ राज्यों और राजनीतिक दलों ने आपत्ति जताई है और नए आंकड़ों के उपयोग की मांग की है।
राजनीतिक बहस का केंद्र बना मुद्दा
परिसीमन का यह मुद्दा अब राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन गया है। जहां एक ओर सरकार इसे न्यायसंगत और संतुलित बता रही है, वहीं विपक्ष इसे क्षेत्रीय असंतुलन की ओर इशारा करते हुए पुनर्विचार की मांग कर रहा है। आने वाले समय में इस विषय पर और गहन चर्चा की संभावना बनी हुई है।