भारत में आर्थिक और सामाजिक बदलावों के साथ लोगों की जीवनशैली में भी बड़ा परिवर्तन आया है। शारीरिक गतिविधियों में कमी, अनियमित खान-पान, बढ़ती मानसिक तनावपूर्ण दिनचर्या और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का बढ़ता सेवन लोगों की सेहत पर भारी पड़ रहा है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 के आंकड़े संकेत देते हैं कि जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां अब देश के लिए एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनती जा रही हैं।
महिलाओं में तेजी से बढ़ रहा मोटापा
सर्वेक्षण के अनुसार मोटापे की समस्या पुरुषों की तुलना में महिलाओं में अधिक तेजी से बढ़ रही है। देश में महिलाओं के बीच सबसे अधिक मोटापे की दर पुडुचेरी में दर्ज की गई, जहां लगभग 46.3 प्रतिशत महिलाएं इस समस्या से प्रभावित पाई गईं। इसके बाद चंडीगढ़, दिल्ली और पंजाब का स्थान रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि बदलती जीवनशैली, हार्मोनल बदलाव, शारीरिक गतिविधियों की कमी और खान-पान की आदतों में परिवर्तन महिलाओं में बढ़ते मोटापे के प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
पुरुषों में भी बढ़ रहा स्वास्थ्य जोखिम
हालांकि महिलाओं में मोटापे की दर अधिक है, लेकिन पुरुष भी इस चुनौती से अछूते नहीं हैं। सर्वेक्षण में अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के पुरुषों में सबसे अधिक मोटापा दर्ज किया गया। इसके अलावा पंजाब, केरल, तमिलनाडु, दिल्ली और गोवा जैसे राज्यों में भी पुरुषों के बीच मोटापे की दर चिंताजनक स्तर पर पहुंचती दिखाई दी। मोटापा केवल वजन बढ़ने की समस्या नहीं है, बल्कि यह मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग और अन्य गंभीर बीमारियों का प्रमुख कारण बन सकता है।
हाई ब्लड शुगर बना नई महामारी का संकेत
विशेषज्ञों का मानना है कि मोटापे के साथ-साथ हाई ब्लड शुगर के मामलों में वृद्धि भविष्य में मधुमेह के बढ़ते खतरे का संकेत है। कम उम्र में बढ़ता वजन, बैठकर काम करने की आदत और असंतुलित भोजन युवाओं को भी इस समस्या की ओर धकेल रहे हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि समय रहते जीवनशैली में सुधार नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में मधुमेह और उससे जुड़ी जटिल बीमारियों का बोझ काफी बढ़ सकता है।
बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर आई सकारात्मक खबर
जहां मोटापा और ब्लड शुगर को लेकर चिंता बढ़ी है, वहीं बच्चों के स्वास्थ्य संबंधी कुछ आंकड़े राहत देने वाले भी हैं। स्वच्छ पेयजल और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के कारण पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में दस्त के मामलों में कमी दर्ज की गई है। इसके अलावा जन्म के पहले घंटे में नवजात को स्तनपान कराने की दर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। छह माह से कम आयु के अधिकांश बच्चों को मां का दूध मिलने के आंकड़े भी बेहतर पोषण की दिशा में सकारात्मक संकेत देते हैं।
महिलाओं में स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ी, लेकिन नई चुनौतियां भी सामने आईं
सर्वेक्षण में यह भी सामने आया कि किशोरियों और युवतियों के बीच मासिक धर्म के दौरान सुरक्षित और स्वच्छ साधनों का उपयोग बढ़ा है। यह महिलाओं के स्वास्थ्य और स्वच्छता के प्रति बढ़ती जागरूकता को दर्शाता है। हालांकि दूसरी ओर आधुनिक गर्भनिरोधक साधनों के उपयोग में कमी और पारंपरिक तरीकों पर बढ़ती निर्भरता ने स्वास्थ्य विशेषज्ञों का ध्यान आकर्षित किया है। इसे लेकर आगे और अध्ययन तथा जागरूकता की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
विशेषज्ञों ने दी चेतावनी
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि मोटापा और हाई ब्लड शुगर जैसी समस्याओं को केवल व्यक्तिगत बीमारी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर चुनौती है, जिसका प्रभाव आने वाले वर्षों में स्वास्थ्य व्यवस्था और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ सकता है। नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और तनाव प्रबंधन को अपनाकर इन जोखिमों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार स्वस्थ जीवनशैली ही इस बढ़ते संकट से बचाव का सबसे प्रभावी उपाय है।