नई दिल्ली. भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सोमवार को कहा कि महिला प्रदर्शनकारियों के खिलाफ लगाए गए यौन उत्पीड़न और हिंसा के आरोपों को अलग से स्वत: संज्ञान मामले के रूप में लेने की आवश्यकता नहीं है। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। अदालत ने स्पष्ट किया कि पूर्व न्यायाधीश आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता में गठित 5 सदस्यीय उच्चाधिकार प्राप्त जांच समिति को इन आरोपों की जांच की जिम्मेदारी पहले ही दी जा चुकी है।
महिलाओं के खिलाफ आरोपों की जांच प्राथमिकता से
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पिछले सप्ताह गठित उच्चाधिकार प्राप्त जांच समिति को प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा से जुड़े विभिन्न आरोपों की स्वतंत्र जांच करने का निर्देश दिया गया है। समिति को विशेष रूप से महिला प्रदर्शनकारियों के खिलाफ लक्षित हिंसा, उत्पीड़न, छेड़छाड़ और यौन दुर्व्यवहार के आरोपों की प्राथमिकता के आधार पर जांच करने को कहा गया है। अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि शिकायतों की जांच जल्द आगे बढ़ाई जाए, ताकि आरोपों से जुड़े तथ्यों को समय रहते सामने लाया जा सके।
वरिष्ठ अधिवक्ता ने अलग स्वत: संज्ञान की मांग की
सोमवार को सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने पीठ के समक्ष महिला प्रदर्शनकारियों के कथित यौन उत्पीड़न का मुद्दा उठाया। उन्होंने अदालत से इस मामले में स्वत: संज्ञान लेने और अलग जांच व्यवस्था स्थापित करने का अनुरोध किया। उनका कहना था कि 20 जुलाई के प्रदर्शन के दौरान महिलाओं के साथ कथित दुर्व्यवहार और यौन उत्पीड़न के आरोप व्यापक रूप से सामने आए हैं। उन्होंने आरोपों की गंभीरता को देखते हुए स्वतंत्र तरीके से जांच किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
पुलिसकर्मियों पर भी लगाए गए गंभीर आरोप
अदालत के समक्ष दलील दी गई कि महिला प्रदर्शनकारियों के साथ कथित छेड़छाड़ और यौन उत्पीड़न में पुलिसकर्मियों की भूमिका के आरोप भी सामने आए हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र जांच की मांग करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि पीड़ित महिलाओं की शिकायतों के लिए प्रभावी और भरोसेमंद तंत्र जरूरी है। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अदालत ने पहले से गठित जांच समिति के अधिकार क्षेत्र की ओर ध्यान दिलाया और कहा कि इन आरोपों को उसी प्रक्रिया के तहत प्राथमिकता से देखा जाएगा।
18 अगस्त के आदेश का दिया हवाला
मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के 18 अगस्त के आदेश का उल्लेख किया, जिसके तहत उच्चाधिकार प्राप्त जांच समिति का गठन किया गया था। पीठ ने कहा कि समिति को महिला प्रदर्शनकारियों के खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोपों की जांच करने का स्पष्ट निर्देश दिया जा चुका है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि समिति को इन शिकायतों पर प्राथमिकता से काम करते हुए जल्द से जल्द अंतरिम रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा गया है। ऐसे में उसी विषय पर अलग स्वत: संज्ञान कार्यवाही शुरू करना आवश्यक नहीं समझा गया।
जल्द अंतरिम रिपोर्ट पेश करने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट के रुख से स्पष्ट है कि फिलहाल अदालत का जोर एक ही स्वतंत्र जांच व्यवस्था के माध्यम से सभी संबंधित आरोपों की पड़ताल कराने पर है। समिति को हिंसा, उत्पीड़न और महिला प्रदर्शनकारियों से संबंधित शिकायतों को प्राथमिकता देने के साथ जल्द अंतरिम रिपोर्ट देने को कहा गया है। अब जांच समिति की रिपोर्ट इस पूरे घटनाक्रम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी और उसके निष्कर्षों के आधार पर आगे की न्यायिक कार्रवाई की दिशा तय हो सकती है।