नई दिल्ली. सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार को दिल्ली में हुए विरोध मार्च को लेकर दायर याचिकाओं की सुनवाई के दौरान कड़ी टिप्पणी की। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची की पीठ ने कहा कि न्यायालय हाथीदांत के टॉवर में नहीं बैठा है। यह टिप्पणी उस समय आई जब याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया ने राजनीतिक जुलूस को लेकर चिंता जताई। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसकी गरिमा और स्वतंत्रता को किसी भी प्रकार से प्रभावित करने का प्रयास स्वीकार्य नहीं है। इस सुनवाई में न्यायिक व्यवस्था की गरिमा बनाए रखने पर विशेष जोर दिया गया। पूरे प्रकरण को न्यायालय ने गंभीरता से लिया।
दो याचिकाओं पर नोटिस जारी
पीठ ने समान राहत की मांग वाली दो याचिकाओं पर नोटिस जारी किया। इन याचिकाओं में न्यायालयों के पास विरोध प्रदर्शन और जुलूसों को विनियमित करने तथा राजनीतिक नेताओं के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई की मांग की गई है। याचिकाओं में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव और तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा के नाम शामिल हैं। न्यायालय ने इन याचिकाओं को सुनने के बाद संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। यह कदम न्यायिक परिसर की सुरक्षा और गरिमा को लेकर उठाया गया महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
12 अक्टूबर के विरोध मार्च की पृष्ठभूमि
12-Oct.-2026 को विपक्षी नेताओं और समर्थकों ने सर्वोच्च न्यायालय की ओर मार्च निकाला था। यह प्रदर्शन चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े मुद्दों को लेकर किया गया था। इससे पहले लोकसभा और राज्यसभा में विपक्ष के नेताओं ने मुख्य न्यायाधीश से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपने का अनुरोध किया था। मुख्य न्यायाधीश ने यह कहते हुए मुलाकात से इनकार कर दिया था कि संबंधित मुद्दे पहले से ही न्यायालय में लंबित हैं। इस इनकार के बाद नेताओं ने न्यायालय परिसर की ओर प्रदर्शन का सहारा लिया। इस घटना ने न्यायपालिका और राजनीति के बीच सीमाओं को लेकर बहस छेड़ दी।
वरिष्ठ अधिवक्ता की दलील और वकीलों की चिंता
वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव भाटिया ने सुनवाई के दौरान कहा कि यह अस्वीकार्य है कि सर्वोच्च न्यायालय को राजनीतिक जुलूस का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि न्यायालय परिसर में जो कुछ हुआ वह नहीं होना चाहिए था। भाटिया ने वकीलों के बीच फैली नाराजगी का उल्लेख करते हुए बताया कि लगभग 200 वकीलों ने एक ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं जिसमें ऐसे आचरण को धमकाने वाला बताया गया है। उन्होंने न्यायालय से इस घटना को गंभीरता से लेने का अनुरोध किया। वकीलों की इस चिंता ने पूरे मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया। न्यायालय ने इन दलीलों को ध्यानपूर्वक सुना।
मुख्य न्यायाधीश का स्पष्ट संदेश
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने अधिवक्ता की दलील का जवाब देते हुए साफ कहा कि हमें कोई धमका नहीं सकता। उन्होंने जोर दिया कि न्यायालय अपनी स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा के लिए पूरी तरह सक्षम है। मुख्य न्यायाधीश की इस टिप्पणी से यह स्पष्ट हो गया कि न्यायपालिका किसी भी बाहरी दबाव या प्रदर्शन से प्रभावित नहीं होगी। उन्होंने कहा कि न्यायालय हाथीदांत के टॉवर में नहीं बैठा है बल्कि आम नागरिकों के अधिकारों और संविधान की रक्षा के लिए सक्रिय है। यह संदेश न्यायिक स्वतंत्रता को लेकर न्यायालय के दृढ़ रुख को दर्शाता है। पूरे कानूनी समुदाय में इस टिप्पणी को सकारात्मक रूप से लिया गया।
न्यायालयों के पास प्रदर्शन को लेकर व्यापक चिंता
इस पूरे प्रकरण ने न्यायालयों के पास राजनीतिक प्रदर्शन और जुलूसों को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि ऐसे प्रदर्शन न्यायिक प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न करते हैं और वकीलों तथा आम मुवक्किलों के लिए असुविधा पैदा करते हैं। न्यायालय ने इन चिंताओं को गंभीरता से लेते हुए संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई जारी रखी है। आने वाले दिनों में न्यायालय इस मुद्दे पर विस्तृत दिशानिर्देश जारी कर सकता है। न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखने के लिए प्रदर्शनों के नियमन की मांग जोर पकड़ रही है। कुल मिलाकर यह मामला लोकतंत्र में न्यायिक स्वतंत्रता और राजनीतिक अभिव्यक्ति के बीच संतुलन की जरूरत को रेखांकित करता है।