नई दिल्ली. सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति पीएस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि दो से अधिक बच्चे होने पर दंड देने वाले कानूनों की अब कोई व्यावहारिक आवश्यकता नहीं रह गई है। पीठ ने स्पष्ट किया कि इन कानूनों का मूल आधार अत्यधिक जनसंख्या का भय था जो बीते कुछ दशकों में आए जनसांख्यिकीय बदलावों के कारण समाप्त हो चुका है। अदालत ने कहा कि प्रजनन दर 2.1 को सामान्यतः जनसंख्या की प्रतिस्थापन दर माना जाता है और वर्तमान में भारत इस स्तर से नीचे पहुंच चुका है। ऐसे में पुरानी सोच पर आधारित प्रतिबंधात्मक प्रावधानों को जारी रखना उचित नहीं कहा जा सकता। न्यायालय ने जोर दिया कि समाज और कानून दोनों को बदलते यथार्थ के अनुरूप ढलना चाहिए।
2003 के जावेद मामले का संदर्भ और वर्तमान पुनर्विचार
अदालत ने जुलाई 2003 के जावेद बनाम हरियाणा राज्य मामले का विशेष उल्लेख किया जिसमें हरियाणा पंचायती राज अधिनियम 1994 की वैधता की जांच के बाद दो से अधिक जीवित बच्चों वाले व्यक्ति को पंचायत चुनाव लड़ने या पद धारण करने से अयोग्य ठहराए जाने को सही माना गया था। उस समय जनसंख्या वृद्धि की चिंता प्रमुख थी। अब पीठ ने स्पष्ट किया कि परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं इसलिए उस फैसले पर दोबारा विचार आवश्यक हो गया है। इसी आधार पर न्यायालय ने मामले को बड़ी पीठ के पास भेजने का निर्णय लिया ताकि व्यापक दृष्टिकोण से इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर नई रोशनी डाली जा सके। यह कदम भविष्य के नीतिगत निर्णयों के लिए दिशा निर्धारित कर सकता है।
प्रजनन संबंधी निर्णय और संवैधानिक अधिकार का संबंध
पीठ ने रेखांकित किया कि प्रजनन संबंधी फैसले लेने का अधिकार अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का अभिन्न अंग है। व्यक्ति अपनी पारिवारिक योजना स्वयं निर्धारित करने के लिए स्वतंत्र है और राज्य को अनावश्यक रूप से इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। जब जनसंख्या संबंधी आंकड़े स्वयं नियंत्रण की दिशा में अग्रसर हों तो दंडात्मक प्रावधानों की उपयोगिता समाप्त हो जाती है। न्यायालय का मानना है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक यथार्थ दोनों का संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। पुराने कानूनों को बिना पुनर्मूल्यांकन के लागू रखना संवैधानिक मूल्यों के विपरीत हो सकता है। इसलिए इस पहलू पर गहन विचार अपरिहार्य हो गया है।
घटती प्रजनन दर और जनसांख्यिकीय परिवर्तन की वास्तविकता
सर्वोच्च न्यायालय ने गौर किया कि 2003 के बाद से भारत की कुल प्रजनन दर 3.0 से घटकर 1.9 रह गई है। यह गिरावट स्पष्ट संकेत देती है कि जनसंख्या वृद्धि को सीमित करने के उद्देश्य से बनाए गए कठोर कानून अब अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि इन बदलावों पर ध्यान नहीं दिया गया तो देश को गंभीर दीर्घकालिक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। घटती प्रजनन दर भविष्य में कार्यबल और सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था पर भी प्रभाव डाल सकती है। इसलिए नीति निर्माताओं और न्यायपालिका दोनों को वर्तमान आंकड़ों के आधार पर सोचने की आवश्यकता है। पुरानी आशंकाओं पर टिके रहना अब संभव नहीं रह गया है।
वर्तमान मामले की परिस्थितियां और याचिका का सार
न्यायालय मंगला भीमराव इंगले की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। काकोडा ग्राम पंचायत के सरपंच पद पर उनके निर्वाचन को इस आधार पर रद्द कर दिया गया था कि उनकी दो से अधिक संतानें हैं जो महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम 1959 की धारा 14 के संबंधित प्रावधान का उल्लंघन करती हैं। याचिकाकर्ता ने इस अयोग्यता को चुनौती दी थी। अदालत ने पाया कि ऐसे प्रावधान अब बदलते जनसांख्यिकीय परिदृश्य में न्यायसंगत नहीं रह गए हैं। इसलिए पूरे मुद्दे को बड़ी पीठ के समक्ष रखने का निर्णय लिया गया ताकि व्यापक संवैधानिक दृष्टिकोण से इसका निपटारा हो सके। यह मामला स्थानीय निकाय चुनावों से जुड़े कई अन्य मामलों को भी प्रभावित कर सकता है।
भविष्य की चुनौतियां और अनुकूलन की अनिवार्यता
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि हम एक मृत घोड़े पर सवार होकर भविष्य की ओर नहीं बढ़ सकते। किसी भी प्रजाति में केवल सबसे शक्तिशाली या बुद्धिमान ही नहीं बचता बल्कि वही जीवित रहता है जो परिवर्तन के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील और अनुकूल होता है। भारत की जनसंख्या संरचना में आ रहे बदलावों को स्वीकार करना और उनके अनुरूप कानूनों को ढालना समय की मांग है। यदि पुरानी मान्यताओं पर अड़े रहे तो भविष्य की सामाजिक आर्थिक चुनौतियों का सामना करना कठिन हो जाएगा। अदालत का यह दृष्टिकोण नीति निर्माताओं को भी सोचने पर विवश करता है कि जनसंख्या संबंधी कानूनों को समकालीन वास्तविकताओं के अनुरूप पुनर्परिभाषित किया जाए।