कोलार/बेंगलुरु: बेंगलुरु ITAT बेंच के हालिया फैसले ने कैश आधारित कारोबार करने वाले करदाताओं के लिए एक अहम सवाल खड़ा कर दिया है—क्या बैंक खाते में जमा और निकासी दोनों को आय माना जा सकता है? Syed Ghouse Peer vs ITO मामले में ट्रिब्यूनल ने साफ कहा कि बिना जांच-पड़ताल के ऐसा करना गलत हो सकता है।
छोटे कारोबारी की बड़ी मुश्किल
मामला कोलार के एक छोटे सब्जी विक्रेता का है, जो APMC यार्ड में कारोबार करता था। उसने संबंधित वर्ष में ITR दाखिल नहीं किया और नुकसान का दावा किया। लेकिन आयकर विभाग की नजर उसके बैंक खाते पर पड़ी, जिसमें करीब 44.64 लाख रुपये जमा और 2.96 करोड़ रुपये की निकासी दर्ज थी।
नोटिस का जवाब न देने से बढ़ी परेशानी
करदाता ने विभाग की ओर से भेजे गए कई नोटिसों का जवाब नहीं दिया। बताया गया कि वह केवल 9वीं तक पढ़ा-लिखा है और ई-प्रोसीडिंग्स व ईमेल नोटिस से अनजान था। जवाब नहीं मिलने पर आकलन अधिकारी ने एक्स-पार्टी असेसमेंट करते हुए कुल 3.53 करोड़ रुपये को अघोषित आय मान लिया।
ITAT की सख्त टिप्पणी: एक ही पैसे पर दो बार टैक्स नहीं
मामला ITAT पहुंचा तो ट्रिब्यूनल ने आकलन अधिकारी के फैसले पर सवाल उठाए। ITAT ने कहा कि जमा और निकासी दोनों को आय मानना एक ही पैसे पर दो बार टैक्स लगाने जैसा है, जो सही नहीं है। ट्रिब्यूनल ने स्पष्ट किया कि भले ही करदाता ने जवाब नहीं दिया हो, लेकिन आकलन तथ्यों और ठोस आधार पर होना चाहिए।
मामला वापस भेजा, करदाता को मिला मौका
ITAT ने निचली अथॉरिटीज के आदेश को रद्द करते हुए केस को दोबारा जांच के लिए आकलन अधिकारी के पास भेज दिया। साथ ही करदाता को निर्देश दिया गया कि वह सहयोग करे और जमा राशि का स्रोत स्पष्ट करे। इस तरह अपील को सांख्यिकीय आधार पर स्वीकार कर लिया गया।
कैश कारोबार की हकीकत को मिली मान्यता
ट्रिब्यूनल ने यह भी माना कि कैश आधारित कारोबार में जमा और निकासी अक्सर घूमती पूंजी (circulating capital) का हिस्सा होती है, न कि अलग-अलग आय। ऐसे में बिना जांच के दोनों को आय मानना गलत निष्कर्ष दे सकता है।
करदाताओं और विभाग के लिए संदेश
यह फैसला जहां छोटे व्यापारियों के लिए राहत लेकर आया है, वहीं यह चेतावनी भी देता है कि नोटिसों को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है। साथ ही आयकर विभाग को भी यह संदेश है कि आकलन करते समय जल्दबाजी या यांत्रिक तरीके से काम न किया जाए।