डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अमेरिका और ईरान के बीच दो हफ्ते के संघर्ष-विराम की घोषणा के बाद अमेरिकी राजनीतिक गलियारों में तीखी और बंटी हुई प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। जहां कुछ सांसदों ने कूटनीति को सही कदम बताया, वहीं कई नेताओं ने सतर्क रहने और इस समझौते पर सवाल उठाए हैं।
कूटनीति को मिला समर्थन
रिपब्लिकन सांसद मॉर्गन ग्रिफ़िथ ने इस फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि सैन्य दबाव के चलते ईरान बातचीत की मेज पर आया है। उन्होंने कहा कि यह समझौता अमेरिका के उस लक्ष्य की दिशा में अहम है, जिसमें ईरान को परमाणु क्षमता हासिल करने से रोकना शामिल है।
वहीं, पेनसिल्वेनिया के सांसद ब्रायन फिट्ज़पैट्रिक ने इसे “सतर्क लेकिन जरूरी कदम” बताते हुए कहा कि कूटनीति हमेशा प्राथमिकता होनी चाहिए और इससे शांति वार्ता का रास्ता खुलता है।
सतर्कता और निगरानी की मांग
सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने कूटनीतिक प्रयासों का समर्थन तो किया, लेकिन जल्दबाजी में निष्कर्ष निकालने के खिलाफ चेताया। उन्होंने कहा कि हर पहलू की गंभीरता से जांच जरूरी है।
प्रशासन पर उठे सवाल
इंडियाना के सांसद फ्रैंक मृवान ने ट्रंप प्रशासन पर बिना स्पष्ट रणनीति के कदम उठाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि इस संघर्ष का कोई स्पष्ट उद्देश्य नहीं था और अमेरिकी सैनिक अब भी खतरे में हैं।
कैलिफोर्निया के कांग्रेसी केविन काइली ने भी कांग्रेस की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि सैन्य अभियानों पर निगरानी रखना संसद की जिम्मेदारी है।
बयानबाजी पर भी विवाद
सीनेटर लिसा मुर्कोव्स्की और एरिज़ोना के सीनेटर रूबेन गैलेगो ने ट्रंप की तीखी बयानबाजी की आलोचना करते हुए कहा कि इस तरह के बयान अमेरिकी मूल्यों के खिलाफ हैं और इससे वैश्विक स्तर पर खतरा बढ़ सकता है।
वैश्विक असर और भारत पर प्रभाव
यह संघर्ष-विराम ऐसे समय में आया है जब खाड़ी क्षेत्र में तनाव चरम पर है। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति का अहम मार्ग है, और यहां किसी भी रुकावट का असर सीधे ऊर्जा बाजारों पर पड़ता है। भारत जैसे देश, जो इस क्षेत्र से कच्चे तेल के आयात पर निर्भर हैं, इस स्थिति पर करीब से नजर बनाए हुए हैं।