कोलकाता। कोलकाता में चुनावी माहौल के बीच पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन जैसे अहम मुद्दों को लेकर बड़ी चर्चा सामने आई है। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं ने स्वीकार किया है कि उनके घोषणापत्र और चुनावी एजेंडे में पर्यावरण को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिल पाती।
बैठक में सामने आई सच्चाई
28 मार्च को कोलकाता प्रेस क्लब में आयोजित ‘पॉलिटिक्स मीट्स पर्यावरण’ कार्यक्रम में राजनीतिक नेताओं, पर्यावरणविदों, स्वास्थ्य विशेषज्ञों और वरिष्ठ पत्रकारों ने भाग लिया। बैठक में सर्वसम्मति से माना गया कि विकास की राजनीति के बीच पर्यावरणीय मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।
ये हैं प्रमुख पर्यावरणीय चुनौतियां
बैठक में कई गंभीर समस्याओं को रेखांकित किया गया, जिनमें शामिल हैं—
वायु प्रदूषण से घटती जीवन प्रत्याशा
सुंदरबन में बढ़ता जलवायु संकट
गंगा नदी समेत नदियों की खराब स्थिति
खेती में रसायनों और उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग
भूजल स्तर में गिरावट
कचरा प्रबंधन की समस्या और शहरी योजना की कमी
ध्वनि प्रदूषण
राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया
टीएमसी नेता देबाशीष कुमार ने कहा कि उनकी पार्टी पर्यावरण संरक्षण के लिए मैंग्रोव रोपण, सोलर ऊर्जा और गंगा कटाव रोकने जैसे कदम उठा रही है।
वहीं सीपीएम नेता मोहम्मद सलीम ने केंद्र और राज्य सरकारों पर पर्यावरणीय लापरवाही का आरोप लगाया।
कांग्रेस नेता प्रदीप भट्टाचार्य ने माना कि प्रभावशाली लोगों पर कार्रवाई न होने से पर्यावरण कानून कमजोर पड़ जाते हैं।
विशेषज्ञों ने उठाए सवाल
विशेषज्ञों का कहना है कि राजनीतिक दल पर्यावरण को इसलिए प्राथमिकता नहीं देते क्योंकि इससे सीधे वोट नहीं मिलते। उन्होंने सभी दलों को ‘ग्रीन डिमांड चार्टर’ भेजने और घोषणापत्र में किए गए वादों का ऑडिट कराने की मांग की।
क्यों अहम है यह मुद्दा
पश्चिम बंगाल के तटीय इलाके, खासकर सुंदरबन क्षेत्र, जलवायु परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। वहीं शहरी क्षेत्रों में प्रदूषण और कचरा प्रबंधन बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। ऐसे में पर्यावरण को नजरअंदाज करना भविष्य के लिए गंभीर खतरा साबित हो सकता है। कुल मिलाकर, चुनावी राजनीति में पर्यावरण के हाशिए पर होने की बात खुद नेताओं द्वारा स्वीकार किया जाना एक बड़ा संकेत है। अब देखने वाली बात होगी कि आगामी चुनाव में ये मुद्दे सिर्फ चर्चा तक सीमित रहते हैं या नीतियों और जमीनी कामों में भी नजर आते हैं।