साल 2026 का पहला चंद्र ग्रहण फाल्गुन माह की पूर्णिमा तिथि को मंगलवार, 3 मार्च को घटित होगा। यह ग्रहण भारत के साथ-साथ विश्व के कई देशों में प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देने वाला है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जहाँ ग्रहण दिखाई देता है, वहाँ सूतक की मान्यता भी लागू हो जाती है, जिसके चलते शुभ कार्यों, यात्रा, भोजन और धार्मिक आयोजनों पर रोक का विधान माना जाता है।
सूतक काल की धार्मिक मान्यताएँ और सावधानियाँ
ग्रहण लगने से लगभग नौ घंटे पूर्व सूतक आरंभ हो जाता है, जिसे शास्त्रों में अत्यंत संवेदनशील अवधि कहा गया है। इस दौरान देव प्रतिमाओं को स्पर्श नहीं किया जाता, यज्ञ-हवन और पूजा जैसे कर्म स्थगित कर दिए जाते हैं। भोजन ग्रहण करना भी वर्जित माना गया है, अपवाद के रूप में छोटे बच्चों, रोगियों और वृद्धों को छूट दी जाती है। यह काल आत्मशुद्धि, मौन और ध्यान के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता है।
देवी-देवताओं की उपासना और मंत्रजप का महत्व
ज्योतिष और पुराणों में उल्लेख है कि ग्रहण अवधि में वातावरण में विशेष प्रकार की ऊर्जाएँ प्रबल हो जाती हैं। चंद्रमा के आवरण के कारण मन और चित्त पर भी ग्रहण का प्रभाव बढ़ता है। ऐसी स्थिति में भगवान विष्णु की उपासना, स्तोत्र पाठ और विशिष्ट मंत्रजप करने से मानसिक हलचल शांत होती है और जीवन के संकटों से मुक्ति मिलने का मार्ग प्रशस्त होता है। मंत्रजप के प्रभाव से साधक की आत्मशक्ति और संकल्पबल भी दृढ़ होता है।
भगवान विष्णु के सिद्ध मंत्रों का जप क्यों करें
वेद और पुराणों में भगवान विष्णु को पालनहार, संकटनाशक और जीवनधारा के संचालक के रूप में वर्णित किया गया है। चंद्र ग्रहण के समय जब मन की चंचलता, भ्रम और मायावी प्रभाव बढ़ जाता है, तब विष्णु मंत्रों का कंपन साधक के चारों ओर सुरक्षात्मक ऊर्जा क्षेत्र का निर्माण करता है। ऐसा माना गया है कि ग्रहण अवधि में किया गया उनका मंत्रजप सामान्य स्थिति की तुलना में अधिक फलदायी होता है।
चंद्र ग्रहण के दौरान जपने योग्य सिद्ध विष्णु मंत्र
ग्रहण काल में स्नान, ध्यान और आसन पर बैठकर शांत मन से निम्न मंत्रों का जप करना अत्यंत शुभ माना गया है। इन मंत्रों का उद्देश्य मन की शुद्धि, बाधाओं का निवारण और चित्त की स्थिरता प्राप्त करना है।
ॐ नमोः नारायणाय॥
ॐ नमोः भगवते वासुदेवाय॥
ॐ श्री विष्णवे च विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥
शान्ताकारम् भुजगशयनम् पद्मनाभम् सुरेशम्… वन्दे विष्णुम् भवभयहरम् सर्वलोकैकनाथम्॥
मङ्गलम् भगवान विष्णुः, मङ्गलम् गरुडध्वजः… मङ्गलाय तनो हरिः॥
दन्ताभये चक्र दरो दधानं… लक्ष्मी गणेशं कनकाभमीडे॥
ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्मीभयो नमः॥
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद, ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्मयै नमः॥
ग्रहण काल में ध्यान और जप से मिलता है विशेष पुण्य
ज्योतिषीय मतों के अनुसार, ग्रहण का काल मन और चेतना के शोधन का अवसर प्रदान करता है। इस अवधि में किए गए मंत्रजप से न केवल अध्यात्मिक शांति प्राप्त होती है, बल्कि जीवन में उपस्थित अदृश्य बाधाएँ भी क्षीण होती हैं। ग्रहण समाप्त होने पर स्नान, दान और शुद्धि कर्म का विधान भी अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।
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