पुरी। भगवान श्रीजगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा का शुभारंभ आज आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि से हो गया है। यह पर्व केवल ओडिशा ही नहीं बल्कि पूरे देश और दुनिया भर में बसे करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए आस्था और भक्ति का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है। इस वर्ष रथयात्रा का समापन बहुदा यात्रा के साथ होगा, जबकि पूरे महापर्व का समापन नीलाद्री बीजे अनुष्ठान के साथ किया जाएगा। इस पावन अवसर पर भगवान श्रीजगन्नाथ अपने बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ भव्य रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से निकलकर गुंडिचा मंदिर की यात्रा करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार गुंडिचा मंदिर को भगवान की मौसी का घर माना जाता है, जहां भगवान कुछ दिनों तक विश्राम करते हैं।
आज शाम 4 बजे निकलेगी रथयात्रा
छत्तीस निजोग, अनुष्ठान उप-समिति और श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन (एसजेटीए) द्वारा निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, आज शाम 4 बजे तीनों रथों को श्रद्धालुओं द्वारा खींचा जाएगा। लाखों श्रद्धालु भगवान के दर्शन करने और रथ की रस्सी खींचने के लिए पुरी पहुंच चुके हैं। प्रशासन ने सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, ट्रैफिक प्रबंधन और श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए व्यापक इंतजाम किए हैं।
रथयात्रा का धार्मिक महत्व
हिंदू धर्म में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि पर भगवान जगन्नाथ अपने भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ अपनी मौसी के घर यानी गुंडिचा मंदिर जाते हैं। भगवान यहां कुछ दिनों तक प्रवास करते हैं और उसके बाद बहुदा यात्रा के माध्यम से पुनः श्रीमंदिर लौटते हैं। यह यात्रा भगवान के भक्तों के प्रति प्रेम, स्नेह और समानता का प्रतीक मानी जाती है।
क्यों खास होती है जगन्नाथ रथयात्रा?
सालभर भगवान जगन्नाथ के दर्शन श्रीमंदिर के गर्भगृह में होते हैं, लेकिन रथयात्रा के दौरान भगवान स्वयं मंदिर से बाहर निकलकर अपने सभी भक्तों को दर्शन देते हैं। यह ऐसा अवसर होता है जब किसी भी जाति, धर्म, वर्ग या समुदाय का व्यक्ति बिना किसी भेदभाव के भगवान के दर्शन कर सकता है। यही कारण है कि इस यात्रा को सामाजिक समरसता और समानता का सबसे बड़ा प्रतीक भी माना जाता है।
रथ की रस्सी खींचने का क्या है महत्व?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान जगन्नाथ के रथ की रस्सी खींचना अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। ऐसा विश्वास है कि जो श्रद्धालु श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान के रथ को खींचता है, उसके अनेक जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इसी कारण हर वर्ष लाखों श्रद्धालु रथ की रस्सी खींचने का सौभाग्य प्राप्त करने के लिए पुरी पहुंचते हैं।
तीनों रथों की विशेषताएं
रथयात्रा के लिए हर वर्ष विशेष परंपरा के अनुसार नीम की पवित्र लकड़ी से तीन नए रथ बनाए जाते हैं। इन रथों का निर्माण सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं और निश्चित नियमों के अनुसार किया जाता है।
1. भगवान बलभद्र का रथ – तालध्वज
- सबसे आगे चलता है।
- लाल और हरे रंग से सजाया जाता है।
- भगवान बलभद्र इस रथ पर विराजमान होते हैं।
2. देवी सुभद्रा का रथ – दर्पदलन (पद्मरथ)
- बीच में चलता है।
- नीले और काले रंग से सजाया जाता है।
- देवी सुभद्रा इसी रथ पर विराजमान होती हैं।
3. भगवान जगन्नाथ का रथ – नंदिघोष (गरुड़ध्वज)
- सबसे पीछे चलता है।
- लाल और पीले रंग से सजाया जाता है।
- भगवान जगन्नाथ इसी रथ पर विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देते हैं।
किस क्रम में निकलती है रथयात्रा?
रथयात्रा में तीनों रथ निर्धारित क्रम में चलते हैं—
- सबसे आगे भगवान बलभद्र का तालध्वज रथ।
- उसके पीछे देवी सुभद्रा का दर्पदलन रथ।
- सबसे अंत में भगवान जगन्नाथ का नंदिघोष रथ।
रथों का निर्माण कैसे होता है?
रथयात्रा के लिए प्रत्येक वर्ष नए रथ तैयार किए जाते हैं। इनका निर्माण केवल चयनित नीम की लकड़ियों से किया जाता है। अनुभवी कारीगर पारंपरिक विधि और धार्मिक नियमों का पालन करते हुए कई सप्ताह तक इन रथों का निर्माण करते हैं। रथों के आकार, पहियों की संख्या, ऊंचाई, रंग और सजावट भी परंपरा के अनुसार तय होती है।
रथयात्रा के प्रमुख अनुष्ठान
- रथयात्रा केवल एक दिन का आयोजन नहीं है, बल्कि यह कई धार्मिक अनुष्ठानों का क्रम है।
- भगवान का रथों पर विराजमान होना।
- पहंडी विजय।
- छेरा पहरा (गजपति महाराज द्वारा रथों की स्वर्ण झाड़ू से सफाई)।
- रथ खींचने की परंपरा।
- गुंडिचा मंदिर में प्रवास।
- बहुदा यात्रा (वापसी यात्रा)।
- सुनाबेशा।
- अधरपाना।
- नीलाद्री बीजे के साथ महापर्व का समापन।
रवि योग में रथयात्रा का महत्व
इस वर्ष रथयात्रा के दिन रवि योग का भी संयोग बन रहा है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार रवि योग को अत्यंत शुभ माना जाता है। इस योग में भगवान के दर्शन, पूजा-पाठ, दान और धार्मिक कार्यों का विशेष पुण्य प्राप्त होता है। इसलिए इस बार रथयात्रा का महत्व और भी अधिक माना जा रहा है।
देश-विदेश से पहुंचते हैं लाखों श्रद्धालु
पुरी की जगन्नाथ रथयात्रा में हर वर्ष भारत ही नहीं बल्कि विदेशों से भी लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं। यह दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में गिनी जाती है। भक्त भगवान के दर्शन करने, रथ की रस्सी खींचने और इस दिव्य उत्सव का हिस्सा बनने के लिए बड़ी संख्या में पुरी पहुंचते हैं।
निष्कर्ष
भगवान श्रीजगन्नाथ की रथयात्रा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं बल्कि आस्था, समानता, सेवा, समर्पण और सनातन संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। भगवान का मंदिर से बाहर निकलकर अपने भक्तों के बीच आना इस बात का संदेश देता है कि ईश्वर सभी के लिए समान हैं। यही कारण है कि सदियों से यह महापर्व करोड़ों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था और विश्वास का केंद्र बना हुआ है।