हिंदू धर्म में विवाह केवल दो लोगों का मिलन नहीं, बल्कि एक पवित्र “गृहस्थ-आश्रम” की शुरुआत है। इसके विपरीत, भगवान शिव पूर्ण संन्यास, वैराग्य और तपस्या के सर्वोच्च आदर्श माने जाते हैं। शिवलिंग ब्रह्मांडीय ऊर्जा का वह स्थिर केंद्र है जो त्याग और योग की दिशा का प्रदर्शक है। नवविवाहित दंपत्ति जीवन के उस चरण में होते हैं जहां प्रेम, आकर्षण और गृहस्थ-धर्म का उदय होता है, इसलिए दोनों ऊर्जाओं के सीधे संपर्क को कई परंपराओं में संतुलन-विरोधी माना गया है।
शिवलिंग वैराग्य, दंपत्ति गृहस्थ—ऊर्जा का अंतर
महादेव को ब्रह्मचारी, योगी और तांत्रिक साधना के स्वामी के रूप में जाना जाता है। शिवलिंग उन्हीं तपो-ऊर्जाओं का प्रतीक है। वहीं नवविवाहित जोड़े की ऊर्जा “रति–सर्जन–स्थापन” की होती है। शास्त्रीय दृष्टि से कहा गया है कि वैराग्य की ऊर्जा और गृहस्थ की ऊर्जा का तत्काल संपर्क मनोभावों और स्थिरता पर प्रभाव डाल सकता है। यह एक कारण माना जाता है कि कई परंपराओं में दंपत्तियों को प्रारंभिक समय में केवल जल अर्पित करने की ही सलाह दी जाती है।
शिवलिंग में निहित तीव्र आध्यात्मिक ऊर्जा
शिवलिंग को ‘अनंत-स्फुरण’ का केंद्र माना गया है। यह केवल एक पूजा-वस्तु नहीं, बल्कि सूक्ष्म ऊर्जा का अतिशय शक्तिशाली रूप है। नवविवाहित दंपत्ति भावनात्मक, मानसिक और शारीरिक रूप से नयी परिस्थितियों से गुजर रहे होते हैं। ऐसे में अत्यधिक शक्तिशाली ब्रह्मांडीय ऊर्जा के सीधे स्पर्श की बजाय दूरी या केवल अभिषेक करना एक सुरक्षित और संतुलित विकल्प माना गया है। यह श्रद्धा और सुरक्षा दोनों का प्रतीक है।
मंदिरों की परंपराएँ और पूजा-मर्यादा का संदेश
अनेक प्राचीन मंदिरों में शिवलिंग स्पर्श से जुड़े विशिष्ट नियम होते हैं। कई स्थानों पर ब्रह्माचारियों, ऋतु-धर्म में महिलाओं या नवविवाहित दंपत्तियों को केवल जल चढ़ाने की अनुमति होती है। यह न तो दंड का संकेत है, न ही अशुभता का भय, बल्कि “मर्यादा” का एक हिस्सा है। जैसे गर्भगृह में प्रवेश के भी नियम होते हैं, वैसे ही शिवलिंग स्पर्श के नियम भी आचार-संहिता के प्रतीक हैं।
पौराणिक कथाओं का सांकेतिक संदेश
शिवलिंग सृष्टि—संहार—तप—ऊर्जा के अद्वितीय संतुलन का प्रतिनिधित्व करता है। विवाह के बाद दंपत्ति स्वयं “नई सृष्टि” के मार्ग पर होते हैं। इस कारण कुछ पौराणिक परंपराएँ संकेत देती हैं कि नया दंपत्ति कुछ समय तक वैराग्य-ऊर्जा से दूरी रखे ताकि उनका दांपत्य स्थिरता, प्रेम और सामंजस्य के साथ आगे बढ़ सके। यह पूर्ण निषेध नहीं, बल्कि एक ‘सांकेतिक संतुलन’ है।
क्या यह कठोर नियम है?
धर्मग्रंथों में कहीं भी ऐसा स्पष्ट, कठोर निषेध नहीं मिलता कि नवविवाहित दंपत्ति शिवलिंग को छू नहीं सकते। यह मान्यता मुख्यतः परंपरा, ऊर्जा-तत्व और सामाजिक मार्गदर्शन पर आधारित है। अनेक विद्वान मानते हैं कि पूजा में सबसे महत्वपूर्ण भाव, श्रद्धा और नियमों का आदर है—न कि केवल स्पर्श करना या न करना। कुछ परिवार इस परंपरा को मानते हैं, जबकि कई स्थानों पर ऐसा कोई निषेध नहीं है।
अंततः क्या समझना चाहिए?
इस परंपरा का मूल सार “ऊर्जा-संतुलन और जीवन-चरण का सम्मान” है। नवविवाहित दंपत्ति चाहें तो जल अर्पण, अभिषेक, स्तुति और मंदिर-भ्रमण बिना किसी निषेध के कर सकते हैं। स्पर्श करना या न करना धार्मिक कठोरता से अधिक एक आध्यात्मिक संकेत और प्राचीन परंपरा का सम्मान है।
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