नई दिल्ली. नीरजा भनोट का जन्म 7 सितंबर 1963 को पंजाब के चंडीगढ़ में एक पंजाबी हिंदू ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वह पत्रकार हरीश भनोट और रमा भनोट की बेटी थीं। नीरजा ने अपना करियर मॉडलिंग में शुरू किया था मगर किस्मत में उन्हें किसी और चीज में नाम कमाना था। आज हर कोई स्मित मच्छार की वाहवाही कर रहा है उन्हें हीरो बना रहा है। दुनिया भर के देशों के नेता उनकी शान में कसीदे पढ़ रहे हैं मगर भारत की मिट्टी से पहली बार किसी ने ऐसा कारनामा नहीं किया है। 40 साल पहले यही आसमान था और ऐसा ही एक प्लेन मगर उस समय हीरो स्मित नहीं नीरजा भनोट थीं। उनकी कहानी आज भी बहादुरी की मिसाल है।
5 सितंबर 1986 का वह दिन
5 सितंबर 1986 को मुंबई से अमेरिका के न्यूयॉर्क जा रहा पैन एम फ्लाइट 73 विमान कराची पहुंचा था। विमान में 360 यात्री और 19 क्रू सदस्य सवार थे। सुबह लगभग 6 बजे जब कराची में नए यात्री विमान में सवार हो रहे थे तभी सुरक्षाकर्मियों की वर्दी में आए आतंकवादियों ने विमान पर धावा बोल दिया। आतंकवादियों के विमान में घुसते ही सीनियर फ्लाइट पर्सर नीरजा भनोट ने तुरंत सूझबूझ दिखाई। उन्होंने इंटरकॉम के जरिए कॉकपिट क्रू को गुप्त कोड भेजकर सतर्क कर दिया। सूचना मिलते ही पायलट को-पायलट और फ्लाइट इंजीनियर विमान की छत पर बने आपातकालीन रास्ते से बाहर निकल गए। इन तीनों के जाते ही आतंकवादियों के लिए विमान को उड़ाना असंभव हो गया। आतंकवादी विमान को उड़ाकर साइप्रस ले जाना चाहते थे मगर यह प्लान विफल हो चुका था।
अमेरिकी पासपोर्ट छिपाने की सूझबूझ
गुस्साए आतंकवादियों ने अब अमेरिकी यात्रियों को ढूंढना शुरू कर दिया। यात्रियों में डर बनाने के लिए उन्होंने एक भारतीय-अमेरिकी यात्री को विमान के गेट पर लाकर गोली मार दी और शव को रनवे पर फेंक दिया। इसके बाद उन्होंने चालक दल को सभी यात्रियों के पासपोर्ट एकत्र करने का आदेश दिया ताकि वे अमेरिकी नागरिकों की पहचान कर सकें। मगर नीरजा भनोट और उनकी टीम ने फिर एक साहसिक कदम उठाया। उन्होंने चतुराई से सभी 43 अमेरिकी पासपोर्टों को सीटों के नीचे और कचरे के डिब्बे में छिपा दिया जिससे आतंकवादी अमेरिकी यात्रियों की पहचान नहीं कर पाए। लगभग 17 घंटे तक आतंकवादी दबाव बनाते रहे। नीरजा की इस सूझबूझ ने कई जानें बचाईं।
अंतिम बलिदान और यात्रियों की सुरक्षा
रात होते ही विमान का जनरेटर बंद हो गया जिससे केबिन की बत्तियां बुझ गईं और वेंटिलेशन बंद हो गया। घबराए आतंकवादियों को लगा कि हमला होने वाला है। उन्होंने अंधाधुंध गोलियां बरसानी और ग्रेनेड फेंकने शुरू कर दिए। अंधेरे और चीख-पुकार के बीच नीरजा ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने तुरंत आपातकालीन निकास द्वार खोल दिया और यात्रियों को बाहर निकालना शुरू किया। जब वे तीन बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाल रही थीं तभी आतंकियों की बंदूकें उनकी तरफ तन गईं। बच्चों को बचाते हुए नीरजा को कई गोलियां लगीं और वे गंभीर रूप से घायल हो गईं। बाद में जिन्ना अस्पताल में उनकी मौत हो गई। इस घटना में कुल 20 से 22 यात्रियों की मौत हुई और लगभग 150 लोग घायल हुए लेकिन नीरजा और क्रू की सूझबूझ से 350 से अधिक लोगों की जान बचा ली गई।
अशोक चक्र और अमर विरासत
अपने जन्मदिन से महज दो दिन पहले नीरजा भनोट ने मानवता की रक्षा करते हुए दम तोड़ दिया। उनके इस सर्वोच्च बलिदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार अशोक चक्र से सम्मानित किया। वे यह सम्मान पाने वाली सबसे कम उम्र की महिला बनीं। इसके अलावा उन्हें पाकिस्तान द्वारा तमगा-ए-इंसानियत और अमेरिका द्वारा भी सम्मानित किया गया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीरजा का नाम हीरोइन ऑफ हाईजैक के तौर पर मशहूर है। वर्ष 2004 में उनके सम्मान में भारत सरकार ने एक डाक टिकट भी जारी किया। आज भी उनकी बहादुरी की कहानी नई पीढ़ी को प्रेरित करती है। नीरजा भनोट भारतीय साहस और कर्तव्यपरायणता की अमर प्रतीक बन गईं।