कोलकाता. पश्चिम बंगाल के कृष्णानगर से सांसद और तृणमूल कांग्रेस की नेता महुआ मोइत्रा ने सर्किट हाउस से कथित रूप से हटाए जाने के मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उनका आरोप है कि नदिया जिले के प्रशासनिक अधिकारियों ने राज्य सरकार की संपत्ति वाले सर्किट हाउस में कमरा आवंटित होने के बावजूद उन्हें वहां से बाहर जाने के लिए मजबूर किया। यह घटना उनके संसदीय क्षेत्र कृष्णानगर में देर रात हुई बताई गई है। मोइत्रा की ओर से इस घटनाक्रम को केवल आवास संबंधी विवाद नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण संवैधानिक और संस्थागत प्रश्न के रूप में पेश किया गया है।
तत्काल सुनवाई की मांग, लेकिन शीर्ष अदालत ने नहीं दी मंजूरी
महुआ मोइत्रा की ओर से पेश वकील ने मामले की शीघ्र सुनवाई की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट की पीठ के समक्ष घटनाक्रम का उल्लेख किया। मामले की सुनवाई प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत तथा न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष हुई। मोइत्रा के वकील ने दलील दी कि मामला स्वतंत्र जांच की मांग करता है और यह कथित घटना ऐसे समय हुई, जब उच्च न्यायालय की ओर से पहले ही एक संरक्षण संबंधी आदेश दिया जा चुका था। हालांकि, शीर्ष अदालत ने मामले को तत्काल सूचीबद्ध करने की मांग स्वीकार नहीं की।
वकील ने बताया संवैधानिक महत्व का मामला
सुप्रीम कोर्ट में मोइत्रा की ओर से यह तर्क दिया गया कि सर्किट हाउस से हटाए जाने की कथित कार्रवाई की परिस्थितियों की स्वतंत्र जांच आवश्यक है। वकील ने कहा कि वह केवल मामले को जल्द सूचीबद्ध किए जाने का आग्रह कर रहे हैं, क्योंकि इसमें महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न जुड़े हुए हैं। यह दलील भी रखी गई कि सांसद के रूप में उन्हें निर्धारित नियमों और अधिकारों के तहत सरकारी सर्किट हाउस में ठहरने की सुविधा मिलनी चाहिए थी, विशेषकर तब जब उनके नाम पर वहां कमरा आवंटित किया गया था। अदालत ने तत्काल सुनवाई से इनकार किया, जिसके बाद अब मामले की आगे की कानूनी प्रक्रिया पर नजर रहेगी।
14 अगस्त की रात का घटनाक्रम बना विवाद की जड़
महुआ मोइत्रा ने 14 अगस्त की रात की घटना को लेकर पहले भी सार्वजनिक रूप से अपनी बात रखी थी। उन्होंने सामाजिक माध्यम पर किए गए एक संदेश में दावा किया था कि सर्किट हाउस के बाहर बड़ी संख्या में लोग एकत्र हो गए थे और ‘जय श्री राम’ के नारे लगा रहे थे। उनके अनुसार, यह स्थिति तब बनी जब उन्होंने कथित रूप से परिसर खाली करने से इनकार कर दिया। मोइत्रा का कहना है कि उन्हें रात के समय सर्किट हाउस से बाहर जाने के लिए दबाव डाला गया, जबकि उन्हें वहां ठहरने के लिए पहले से कमरा आवंटित किया गया था।
लोकसभा अध्यक्ष से भी कर चुकी हैं हस्तक्षेप की मांग
इस विवाद के बाद महुआ मोइत्रा ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को भी पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की थी। उन्होंने नदिया जिला प्रशासन पर सर्किट हाउस खाली कराने के लिए कथित रूप से दबाव बनाने का आरोप लगाया। सांसद ने इसे अपने साथ उत्पीड़न का प्रयास बताते हुए सवाल उठाया कि जब उन्हें राज्य सरकार की संपत्ति में ठहरने के लिए विधिवत कमरा आवंटित किया गया था, तो फिर उन्हें आधी रात को वहां से हटने के लिए क्यों कहा गया। मोइत्रा ने इस मामले में कानूनी कार्रवाई करने की बात भी पहले कही थी।
संसदीय सत्र के बाद ठहरने पहुंची थीं महुआ मोइत्रा
मोइत्रा के अनुसार, वह संसदीय सत्र के बाद रात में ठहरने के लिए कृष्णानगर स्थित सर्किट हाउस पहुंची थीं। उनका दावा है कि सांसद होने के नाते उन्हें वहां ठहरने का अधिकार था और इसी आधार पर उन्हें कमरा भी आवंटित किया गया था। इसके बावजूद जिला प्रशासन की ओर से कथित रूप से उन्हें परिसर छोड़ने के लिए कहा गया। उनका आरोप है कि अधिकारियों ने आधी रात के समय उन्हें स्थान बदलने के लिए मजबूर करने का प्रयास किया, जिसे उन्होंने उत्पीड़न और अनुचित दबाव बताया।
प्रशासन की कार्रवाई और राजनीतिक विवाद पर रहेगी नजर
सर्किट हाउस से कथित बेदखली का यह मामला अब राजनीतिक विवाद के साथ-साथ कानूनी रूप भी ले चुका है। महुआ मोइत्रा की ओर से सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद मामले ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया है, हालांकि शीर्ष अदालत द्वारा तत्काल सुनवाई से इनकार किए जाने के बाद अभी आरोपों की न्यायिक जांच पर कोई तत्काल आदेश नहीं दिया गया है। दूसरी ओर, मामले में जिला प्रशासन की भूमिका, आवंटन की परिस्थितियां और कथित रूप से आधी रात को परिसर खाली कराने के प्रयास से जुड़े तथ्य आगे की कानूनी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण रह सकते हैं। फिलहाल यह विवाद सांसद के अधिकारों, प्रशासनिक कार्रवाई और संवैधानिक संरक्षण से जुड़े सवालों के बीच आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है।